यह ब्लॉग खोजें

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

जानव जनऊला ~ (101-150)

101- एक अचंभा देख सुनाय।
पानी पीयय पुछी लमाय।।
मुँड़ी कोत बड़ ललियाय।
आखिर मा जर मर जाय।।
-दीया

102- सोला रानी, तीन ठ यार।
चार चौंकड़ी गोल बजार।।
खेलँय जम्मों जुगत लगाय।
पौ बारा के बोल सुनाय।।
-पासा

103- नान्हें डबिया मा डिबडाब।
नइ जानच ता तैं मुँहु दाब।।
देखय येहा सब ला जान।
तैं नइ देखस येला मान।।
-आँखी

104- लइका नान्हें, कुबरा पेट।
रहिथे दुरिहा सबो समेट।।
बाहिर ले ये कड़क जनाय।
भीतर सबके मन ला भाय।।
-नरियर

105- धरे मोटरा मुँड मा तान।
गजब डोकरी येला जान।।
अपन लार के फाँदा डार।
जौन फँसय वोला दय मार।।
-मेकरा

106- रिंगी-चिंगी फूलय फूल।
फर फरथे लमडेरा झूल।।
दिखथे काड़ी हड़ही सार।
लेकिन भीतर भरे गुदार।।
-मुनगा

107- माढ़े तरिया के ये बीच।
जइसे गोबर या के कीच।।
पखरा जइसन भारी ठोस।
रेंगय ये हा कतको कोस।।
-केछुवा

108- बिन पानी के ग कुआँ चार।
लाली करिया अउ उजियार।।
रानी अउ अट्ठारा चोर।
जिरमुल जम्मों हें चिरबोर।।
-कैरम अउ गोंटी

109- हवय एकठन घर अउ द्वार।
जौन रहय वो ही हुशियार।।
कथा कंथली बहुते ज्ञान।
संगत एखर, बनय महान।।
-पुस्तकालय

110- नान्हें लइका करिया रंग।
खाय भात राजा के संग।।
लइका जूठा राजा खाय।
राजा ला बीमारी आय।।
-माछी

111- हरदी के रंगे रंगाय।
पीतल लोटा नाँव धराय।।
खा ले बेटा हाथ लमाय।
गिर परही तब गय छरियाय।।
-बेल

112- पातर दुब्बर लइका जान।
पहिरँव लकड़ी के मैं थान।।
जतको मोला छोलत जाव।
नवा-नवा तुम मोला पाव।।
-शीश (पेंसिल)

113- निकलय पानी ले रुख एक।
नइ हे पाना, डार अनेक।।
खाल्हे कोनो बइठ न पाय।
तीर खड़े मा जाड़ जनाय।।
-फब्बारा

115- रानी जेखर तीन ठ पाँव।
रोज नहावय अपने ठाँव।।
दार भात के नइ पहिचान।
खावय कच्चा पोठ पिसान।।
-चौंकी बेलना

116- जब-जब गरमी के दिन आय।
सबझन येला तीर बलाय।।
पीयय पानी भर-भर पेट।
ठंड हवा गरमी दय मेट।।
-कूलर

117- लोहा के दूठन तलवार।
करँय लड़ाई बड़ दमदार।।
तभो रहँय इन एक्के संग।
दिखथे जुड़वा जइसे रंग।।
-कैंची

118- जीभ नहीं पर बोलँव बोल।
पाँव नहीं पर डोलँव गोल।।
राजा परजा सब ला भाँव।
जम्मों खुशहाली मैं लाँव।।
-रुपिया

119- चार गोड़ पर नइ रेंगाय।
हालय नइ ये बिना हलाय।।
सब ला देवय ये आराम।
तुरत बतावव एखर नाम।।
-खटिया

120- फटफट-फटफट धरथे राग।
सरपट-सरपट जावय भाग।।
दू चक्का मा जावय डोल।
भूख लगय पीयय पेट्रोल।।
-फटफटी

121- थापक थउआ हावय पेड़।
बाढ़य बखरी-बारी मेंड़।।
चाकर झाफर एखर पान।
बिन बीजा के हे, पहिचान।।
-केरा

122- कटही हावय एखर अंग।
पान बहेरा जइसे संग।।
फूल रतन कस रहिथे लाल।
फागुन मा ये दिखय कमाल।।
-सेम्हरा

123- एक चघय जी ऊँच पहार।
एक रहय जी जंगल खार।।
एक रहय जी खेत मरार।
तीनों एक्के करय गुजार।।
-मखना

124- नान्हें बटकी रस भरमार।
खावँय चुहकँय ले चटकार।।
होथे हरियर पींयर गोल।
का हे तेला तुरते बोल।
-लिमँऊ

125- घपटे रहिथे खाल्हे छाँव।
बाप-पूत के एक्के नाँव।
नाती के तैं नाँव विचार।
महर-महर ममहावय खार।।
-मउँहा

126- चाकर पाना पातर पेड़।
ठाढ़े जंगल खारे मेड़।।
पतरी दोना बनथे पान।
फुलुवा आग जइसन जान।।
-परसा

127- कुबरा बुढुवा नुनछुर खाय।
बड़े जवनहा अमसुर भाय।।
बीजा आवय खेले काम।
मुँह मा पानी लेवत नाम।।
-अमली

128- करिया कुरता सादा अंग।
गाँव शहर मा सबके संग।।
पढ़े लिखे अउ अप्पढ़ खाय।
नून डार ले, बहुत मिठाय।।
-चिरई जाम

129- ये गरीब के सेब कहाय।
हरियर पींयर फर मन भाय।।
गुदा लाल सादा मा होय।
चिक्कन डारा झिम्मट सोय।।
-बीही

130- हरियर पींयर रहिथे गोल।
काँटा-खूँटी पाना डोल।।
कोंवर बाहिर, भीतर खोल।
फोर गुठलू खालव डोल।।
-बोईर

131- डम डम डम के फूटय बोल।
छम छम छम तैं संगे डोल।।
धरे मदारी गँवई आय।
भलुवा के नाचा देखाय।।
-डमरू

132- बाहिर हरियर भीतर लाल।
करिया बीजा गजब कमाल।।
खावव चानी-चानी चान।
फर ये गरमी मा वरदान।।
-कलिंदर

133- पाना-पाना बड़ भरमार।
अंग-अंग हे सरी गुदार।।
नइ तो बीजा कोनो हाड़।
बिन लकड़ी के ये हा झाड़।।
-केरा

134- होवय बहुते नदी कछार।
लसलस फरथे, लहसै डार।।
किचपिच बीजा भरे हजार।
लाली सादा मीठ गुदार।।
-बीही

135-  कच्चा मा ये साग खवाय।
पक्का मा सबके मन भाय।।
करिया बीजा रथे हजार।
कोला-बारी उपजै मार।।
-अरंपपई

136-  कच्चा मा बड़ अम्मठ स्वाद।
पक्का मा बस गुरतुर गाद।।
झोत्था-झोत्था फरथे डार।
छछले रहिथे एखर नार।।
-अंगूर

137- फर के राजा येला जान।
हवय 'खास'  जाय एखर शान।।
कच्चा मा चटनी तैं डार।
पक्का मा गोही चटकार।।
-आमा

138- भुँइयाँ भीतर रहै उदास।
निकलय बाहिर, बनजय खास।।
सँघरा सबसे येला जोर।
इही बनावय बढ़िया झोर।।
-आलू

139- लाली-लाली कुरता लाल।
हरियर फीता फभे कमाल।।
रँधनी घर मा एखर राज।
नाँव बतावव तुरते आज।।
-पताल

140- जइसन नाँवे वइसन रंग।
लहिथे येहा सबके संग।।
मुँड़ मा कटही रखवार।।
येला खाये सब तइयार।।
-भाँटा

141- हरियर चुन्दी सादा रंग।
गड़े रहय भुँइयाँ के संग।।
भाजी एखर सुघर मिठाय।
चुरपुर-गुरतुर स्वाद सुहाय।।
-मुरई

142- माथा उपजे धनिया पान।
रंग गाजरी हे पहिचान।।
हलुआ खा ले ताते तात।
कच्चा मा तो भाथे घात।।
-गाजर

143- चारों मूँड़ा घपटे पान।
सादा पोनी बीच म जान।।
होथे फर भाजी छतनार।
खूब मिठाथे ये दमदार।।
-गोभी

144- फरथे येहा लामी-लाम।
भीतर बीजा भरे तमाम।।
अँगरी जइसन एखर ढ़ंग।
हरियर पींयर एखर रंग।।
-रमकेरिया

145-  फुलुवा के राजा तैं जान।
कटही तन एखर पहिचान।।
महर-महर ममहाथे घात।
संझा बिहना दिन अउ रात।।
-गुलाब

146- पातर-पातर पाना पोठ।
डारा फुलुवा रहय न मोठ।।
पींयर-पींयर पँखुड़ी गोल।
अँगना के शोभा अनमोल।।
-गोंदा

147- जरी धँसे हे पानी कीच।
छछले सुग्घर तरिया बीच।।
खा ले फर, हे जुड़वास।
एखर डारा सब्जी खास।।
-कमल/पोखरा/ढ़ेस

148- जेती बेरा ओती घूम।
जब्बर जकना, जाथे झूम।।
पींयर फुलुवा, हरियर पान।
बीजा एखर तेल खदान।।
-सूरजमुखी

149- सरदी के मौसम मा आय।
महर-महर अँगना ममहाय।।
सादा-सादा खिलथे फूल।
आँखी-आँखी जाथे झूल।।
-मोंगरा

150- लाली-लाली लहसे डार।
एखर ले देवी सिंगार।।
अँगना बारी लगे पछीत।
गा ले संगे सेवा गीत।।
-मंदार
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ
9200252055 ~ सृजन -26/04/2021

रविवार, 25 अप्रैल 2021

जानव जनऊला~ (51-100)

51- रानी पानी बीच कहाय।
भुँइयाँ मा ये नइ जी पाय।।
रोजे येहा धोय नहाय।
तभो कभू नइ तो ममहाय।।
-मछरी

52- पखरा जइसन ऊपर खोल।
खाल्हे पींयर कोंवर सोल।।
चार पाँव मा रेंगय सोज।
पानी भाँठा येला खोज।।
-केछुवा

53- पानी बिन ये महल बनाय।
कारीगर ये सुघर कहाय।।
छै ठन रहिथे एखर पाँव।
सोच समझ के नाँव बताव।।
-मेकरा

54- लाली मुँहु के नोनी आय।
फीता हरियर गजब गँथाय।
जब हटरी मा बइठे जाय।
तुरते-ताही ये बेंचाय।।
-पताल

55- आगू-पाछू चलथे चाल।
रहिथे करिया भुरुवा लाल।।
रथे पाँच जोड़ी मा पाँव।
बिला भीतरी एखर ठाँव।।
-केकरा

56- मुँड़ी पुछी हे, नइ हे पाँव।
सर सर सरकय देखत जाव।।
दाँत पेट हे, नइ हे कान।।
गुजगुजहा एखर पहिचान।।
-साँप

57- गेंद नहीं पर हावय गोल।
लाम पुछी पर पशु झन बोल।।
धरय पुछी ला खेलँय खेल।
देवँय जम्मों गजब गदेल।।
-फुग्गा

58- भैरी हावँव, हावय कान।
हाथ पाँव हे, नइ हे प्रान।।
जौने मोला लय पोटार।
करय गजब के मया दुलार।।
-पुतरा-पुतरी

59- चकमिक-चकमिक हावय रंग।
रहिथँव लइकामन के संग।।
गोली नोहँव, हावँव गोल।
अड़बड़ सस्ता हावय मोल।।
-बाँटी

60- पाँव नहीं पर नाचय गोल।
आगू-पाछू लइका डोल।।
पातर बाती येला नेत।
खेलत खानी करले चेत।।
-भौंरा (लट्टू)

61- लानव लकड़ी देवव छोल।
आगू-पाछू चोक्खू गोल।।
जतके जादा खावय मार।
भागय दुरिहा पल्ला झार।।
-इब्भा (गिल्ली)

62- दू थँगिया हे एखर हाथ।
चमड़ा रब्बड़ देवय साथ।।
मारय गोली नेत लगाय।
चलव बतावव येहा काय।।
-गुलेल

63- लोहा टीना झट चटकाय।
रब्बड़ येला तुरत हराय।।
भुँसा बीच सूजी लय खोज।
रथे गोलवा, चाकर सोज।।
-चुंबक

64- बिना पाँव के चलथे घात।
बिहना संझा दिन अउ रात।।
टिकटिक रेंगय तीनों हाथ।
पोंछत राहय अपने माथ।।
-घड़ी

65- इक महतारी, लइका तीस।
सात रंग मा सबो गढ़ीस।।
एक बछर मा बारा बेर।
जम्मों परथें एखर फेर।।
-महीना

66- शुरू कटे ता बनथे गीत।
बीच कटे ता संत पुनीत।।
कटे आखिरी बनथे यार।
एक संग मा सुर रसदार।।
-संगीत

67- मोर नाँव मा आखर तीन।
उड़ियाथौ पर हरँव मशीन।
सीधा-उल्टा एक समान।
झटपट मोला तैं पहिचान।।
-जहाज

68- लाली डिबिया पिंयर पेट।
राखय लाखों दाँत समेट।।
फरय पेड़ मा, नइ हे नार।
बड़ गुणकारी, बड़ दमदार।।
-अनार

69- एक नानकुन मटकूदास।
कपड़ा पहिरै बीस पचास।।
लाली सादा एखर रंग।
सबला रोवाय करय तंग।।
-गोंदली

70- हावय अइसन एक फकीर।
जेखर पेट म परे लकीर।।
उपजय बाढ़य सबके खेत।
लगय भूख तब एखर चेत।।
-गहूँ

71- एक गुफा के दू रखवार।
होय दुनों के जय जयकार।।
करिया भुरुवा सादा रंग।
रहय सदा मुखड़ा के संग।।
-मेछा

72- पंख नहीं पर उड़ते जाय।
संग हवा के ये बतियाय।।
हाथ नहीं पर लड़ते जाय।
बिन चाकू के काट गिराय।।
-पतंग

73- एक अचंभा, गजब कमाल।
डारव हरियर, निकलय लाल।।
पक्का होवय जतके चाब।
सकय न कोनो येला दाब।।
-पान

74- काया मोर गोलवा गोल।
नारी जाँथें देखत डोल।।
काँच प्लास्टिक मोरे अंग।
रिंगी-चिंगी हावय रंग।।
-चूरी

75- बात बतावव मैं हा खास।
का घटना हे आसेपास।।
रोज बिहनिया सबके द्वार।
पढ़के बनथे सब हुशियार।।
-अखबार

76- बइठे-बइठे एक्के ठाँव।
पहुँचावव मैं सब ला गाँव।।
डामर करिया मोरे रंग।
चलना सब ला मोरे संग।।
-सड़क

77- जतके जादा आगू जाय।
वतके पाछू छुटते पाय।।
एक संग नइ रेंगे आय।
तभो सबो ला जा पहुँचाय।।
-कदम (पाँव)

78- कर्री आँखी देख डराय।
घर भर भारी उधम मचाय।।
कुतर-कुतर करथे हलकान।
चीं-चीं के ये गावय गान।।
-मुसुवा

79- दू झन सुग्घर लइका नेक।
रंग रूप मा हावय एक।।
रथे सँघरा बनथे काम।
तुरत बतावव एखर नाम।।
-पनही

80- तीन वर्ण के हावय नाम।
कटै शुरू तब जय श्री राम।।
बीच कटै ता फल के नाँव।
कटै आखिरी, काट मड़ाँव।।
-आराम

81- दू आखर के हावय नाम।
हरदम रहिथे सरद जुकाम।।
काजग हावय मोर रुमाल।
काम मोर हे गजब कमाल।।
--पेन

82- रोवाना हे एखर काम।
लाली बाई हावय नाम।।
हरियर पहिरे लुगरा लाम।
दू पइसा हे एखर दाम।।
-मिरचा

83- हरियर हँव, पाना झन जान।
करँव नकल, झन बंदर मान।।
मिरचा खाथँव मैं हा पोठ।
तपत कुर्रु के करथँव गोठ।।
-मिट्ठू

84- हरियर घेरा पिंयर मकान।
रहँय इहाँ करिया इंसान।।
रहै रंधनीघर मा धाक।।
फागुन मा ये जाथे पाक।।
-सरसों

85- पाँव नहीं पर जाथे पार।
पेट रिता तब बड़ रफ्तार।।
भागय सरपट पानी चीर।
बिन पतवार हाल गंभीर।।
-डोंगा

86- आगू-पाछू डोलय मोर।
करय कभू नइ काँही शोर।।
अँधियारी मा कहाँ लुकाय।
देख अँजोरी तुरते आय।।
-अपन छँइहाँ

87- सबके घर रहिथँव बिन खाय।
कोन्हों नइ पानी पीयाय।।
करँय भरोसा सब संसार।
महीं हरँव घर के रखवार।।
-तारा (ताला)

88- कुकरा नो हे, मुँड मा मौर।
जंगल झाड़ी एखर ठौर।।
नाचय बरखा बादर देख।
सतरंगी हे, नाँव सरेख।।
-मँजूर

89- करिया हे पर नो हे काग।
लंबा हे पर नो हे नाग।।
अँइठन हे पर नो हे डोर।
झटपट संगी करलव शोर।।
-बेनी (चोटी)

90- खाथे येहा गोली गोल।
डरथे जम्मों सुनके बोल।।
दबथे घोड़ा भागय सोज।
ठाठ हाथ मा, गोली खोज।।
-बंदूक

91- कचर कचर सब येला खाँय।
काट मुँड़ी तब नून लगाँय।।
बारी बखरी छछलै नार।
भीतर बीजा के भरमार।।
-खीरा

92- खाय नहीं पर गजब चबाय।
काड़ी कोंवर नीक जनाय।।
दाँत जीभ चमचम चमकाय।
बीमारी ला मार भगाय।।
-दतुवन

93- एक सवारी चालक चार।
सुते जाय ये पाँव पसार।।
आगू-आगू एखर चाल।
पाछू मा जनता बेहाल।।
-मुरदा

94- करिया हँड़िया उज्जर भात।
खालव संगी ताते-तात।।
हवय भरे येमा जुड़वास।
तरिया भीतर करय निवास।।
-सिंघाड़ा

95- खाय न दाना पानी घास।
होय नहीं ये कभू उदास।।
ले जावय बइठा के पीठ।
करै कभू नइ येहा ढीठ।।
-साइकिल

96- हावय एखर रानी चार।
एक हवय राजा दमदार।।
पाँचों जुरमिल करथें काज।
सुग्घर सुमता साजँय साज।।
-अँगरी, अँगठा

97- एक फूल करिया मुस्काय।
मुँड मा सबके सुघर सुहाय।।
घाम परै ता खिल-खिल जाय।
छँइहाँ मा ये झट मुरझाय।।
-छतरी

98- अपन ददा के रहिथे संग।
आगर बेटा के हे रंग।।
उँचहा हावय इँखर मकान।
बीच खोतली बसथे प्रान।।
-नरियर

99- नान्हें लइका बाँधय पार।
कूदत-फाँदत कई हजार।।
करनी एखर लाज बचाय।
बोलव संगी काय कहाय।।
-सुजी सूँत

100- ये लइका दू कौंरा खाय।
चपक बोंड़री डहर बताय।।
करय नहीं ये काँही शोर।
अँधियारी मा होय अँजोर।।
-टॉर्च
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ
9200252055 ~ सृजन - 26/04/2021

जानव जनऊला~ (01-50)

/// जानव जनऊला ///
" जयकारी जनऊला "

01- पहिली ये पाछू जगदीश।
रद्दा खोलय इँखर असीस।।
लागँय जइसे जुड़हा छाँव।
साधक जपथें हरदम नाँव।।
-गुरुदेव

02- हाथी जइसन भारी पेट।
खाथे लाडू सूँड़ लपेट।।
सबले पहिली एखर नाम।
शुरु होथे तब कोनो काम।।
-गणेश भगवान

03- सार कला हे एखर अंस।
सुघर सवारी सादा हंस।।
छेड़य वीणा के सुर तान।
इँखर कृपा ले जम्मों ज्ञान।।
-सरस्वती माता

04- एक जघा जम्मों सकलान।
बइठे पावन आखर ग्यान।।
मंदिर जइसे लागय ठौर।
नाँव बता अब करके गौर।।
-इस्कूल

05- धन दोगानी ले झन तोल।
एखर कीमत हे अनमोल।।
जे पाये ग्यानी बन जाय।
नइ पाये ते मुरुख कहाय।।
-विद्या

06- गुरतुर-गुरतुर बोलँय बोल।
आगू-पाछू  राहँय  डोल।।
लइकामन बर हे भगवान।
बाँटय  एक बरोबर ज्ञान।।
-गुरुजी

07- पेड़ नहीं पर पाना पोठ।
बिन मुँहु के करथे ये गोठ।।
आखर के भारी भंडार।
ज्ञान कला के ये आधार।।
-किताब

08- कोरा-कोरा आरुग कोर।
लिखना हे तब करथें सोर।।
अंतस के सब भर दे भाव।
नइ ते सोज्झे कागज ताव।।
-कापी

09- एखर आगू का तलवार।
नान्हें हे एखर आकार।।
स्याही सँघरा सुग्घर मेल।
आखर उलगय खेलत खेल।।
-कलम

10- होथे करिया-करिया रंग।
उज्जर आखर एखर संग।।
होय अधूरा ये बिन चाक।
कक्षा भीतर  एखर धाक।।
-तख्ता

11- रहिथे येहा पीठ लदाय।
संगे  आथे  संगे  जाय।।
राखय सब ला जोर जँगार।
नाँव बतावव करत विचार।।
-बस्ता

12- नाक धरय अउ झींकय कान।
रतिहाकुन हो या दिनमान।।
आथे बहुते येहा काम।
तुरत बतावव एखर नाम।।
-चश्मा

13- बड़े बिहनिया येहा आय।
संझौती बेरा मा जाय।।
एखर संगे संग अँजोर।
नइ ते अँधियारी घोर।।
-सुरुज

14- सरी जगत के करथे सैर।
भुँइयाँ मा नइ राखय पैर।।
दिन मा सोवय, जागय रात।
करय अँजोरी रतिहा घात।।
-चंदा

15- गिनत-गिनत जम्मों थक जाय।
बगरय बादर कहाँ समाय।।
रतिहाकुन मा इन टिमटाम।
बोलव झटपट एखर नाम।।
-चँदैनी

16- करिया घोड़ा भागे जाय।
पाछू घोड़ा लाल कुदाय।।
ऊँच अगासे  बहुते भाय।
बोलव  संगी  एहर काय।।
-आगी

17- बाँध डोर तैं झुलुवा झूल।
हवा दवा फर देथे फूल।।
मनखे के ये संगी जान।
इही बचाथे सबके प्रान।।
-रुखराई

18- नइ हे एखर कोनो रंग।
ढलथे येहा सबके संग।।
आँच परे बादर चढ़ जाय।
जाड़ परे पखरा लहुटाय।।
-पानी

19- दिखय नहीं पर चलथे जोर।
सरसर-सरसर करथे शोर।।
जीव जगत के सिरतों आस।
एखर बल मा सबके साँस।
-हवा

20- रिंगी-चिंगी  फूलँय  फूल।
तितली भौंरा झूलँय झूल।।
रहिथे येमा जी रखवार।।
जानव  येला  तुरते यार।।
-फुलवारी

21- नइ तो आवय येहा हाथ।
रहिथे फुलुवामन के साथ।।
रिंगी-चिंगी पाखी संग।
रस पी के इन फिरय मतंग।।
--तितली

22- भनभन-भनभन करथे खूब।
फूलुवा मा इन जाथे डूब।।
बिरबिट करिया एखर रंग।
कान करा करथें उतलंग।।
-भौंरा

23- रहिथें जुरमिल छाता डार।
रानी संगे सौ बनिहार।।
चुहक-चुहक रस मैंद सकेल।
गुरतुर मधुरस ठेलम-ठेल।।
-मछेर

24- चीं चीं चीं चहकैं चिरबोर।
रुखराई, घर, अँगना खोर।।
पंख पसारै फुर्र उड़ाय।
सबके मन ला नँगते भाय।।
-बाम्हन चिरई

25- बहुते खबड़ा खाँवे खाँव।
बोल उराठिल काँवे काँव।।
करिया-करिया एखर रंग।
उटपटांग उज्जट उतलंग।।
-कौआ

26- बइठे रहिथे आमाडार।
कुलकै भारी कुहकी पार।।
जब बसंत के आवय बेर।
तब तो बहुते पारय टेर।।
-कोइली

27- हरियर पाँखी लाली चोंच।
समझदार कस एखर सोंच।।
मिरचा देखत जावय डोल।
तपत कुरू के बोलय बोल।।
-मिट्ठू

28- पिंयर खैरा भुरुवा रंग।
राखय मनखे अपने संग।
मिट्ठू के होथे लगवार।
नाँव बतावव एखर यार।।
-मैना

29- घपटे देख घटा घनघोर।
नाचय नँगते मया चिभोर।।
पंछी के राजा कहलाय।।
अपने पँउरी देख लजाय।।
-मँजूर

30- सादा करिया भुरुवा रंग।
खेलँय खावँय मनखे संग।।
पहिली इन चिट्ठी पहुँचाय।
गजब गुटरगूँ बोल सुहाय।।
-परेवा

31- बड़े बिहनिया मुँह दै खोल।
कुकरुस कूँ के बोलय बोल।।
मुँड़ मा कलगी होवय लाल।
धीररास हे एखर चाल।।
-कुकरा

32- भावय येला घुप अँधियार।
दिनभर ये राहय थिरथार।।
आँखी खुसरे, धरहा चोंच।
का चिरई हे तुरते सोंच।।
-घुघुवा

33- दशराहा के दिन तैं खोज।
दिखय भले ये सब ला रोज।।
टेर्र-टेर्र के बोलय बोल।
पंछी ये हावय अनमोल।।
-टेहर्रा

34- एखर थन ले गोरस धार।
दूध दही  घी  के भंडार।।
पैरा भूँसा काँदी खाय।
महतारी के पदवी पाय।।
-गाय

35-लाली धँवरा सादा रंग।
एखर जोड़ी नाँगर संग।।
बड़का सिंग, पुछी हे लाम।
झट्टे जानव का हे नाम।।
-बइला

36- पाना पतई पागुर खाय।
मेर-मेर बहुते नरियाय।।
खैरी कबरी बड़ छतरंग।
खेत-खार मा चरै मतंग।।
-छेरी

37- चुकता चुन्दी देंह छवाय।।
बीच-बीच मा मुँड़ मूँड़ाय।।
कतको काँही आवय जाय।
रेंगय येमन मुँड़ी नवाय।।
-भेंड़ी

38- रतिहाकुन ये चौकीदार।
दिनभर सुतथे पाँव पसार।।
भूँ-भूँ के करथे आवाज।
घर के आगू एखर राज।।
-कुकुर

39- दूध दही मलई चोराय।
मुसुवा ऊपर धाक जमाय।।
आँखी कर्री ला छटकाय।
म्याऊँ-म्याऊँ ये नरियाय।।
-बिलई

40- बहुत उपाई एखर जात।
कूदय फाँदय नाचय घात।।
डारा-पाना देवय टोर।
खीस-खीस खो दाँत निपोर।।
-बेंदरा

41- देंह भरे चुंदी भरमार।
खाय गजब मधुरस दमदार।।
नान्हें आँखी नान्हें कान।
पुछी छोटकुन, झट पहिचान।।
-भलुवा

42- भारी भक्कम हावय पेट।
खावय पीयय सूँड़ लपेट।।
सूपा जइसन जब्बर कान।
कोन हरय येला पहिचान।।
-हाथी

43- खदबिद-खदबिद भागय पोठ।
हिनहिन कहि-कहि होवय गोठ।।
चना चबेना बहुते खाय।
सुघर सवारी ये बन जाय।।
-घोड़ा

44-पिंयर करिया धारीदार।
बहुते बलकर बड़ हुशियार।।
एखर ले सब जीव डराय।
वन के राजा ये ह कहाय।।
-बघवा

45-राहँय जंगल झाड़ी बीच।
बहुते चतुरा  नँगते नीच।।
माड़़ा खुसरे बखत बिताँय।
हुआँ-हुआँ रतिहा इँतराँय।।
-कोलिहा

46-करिया पिंयर छिटही छाप।
दँउड़य भारी एक्के धाप।।
खरखर चढ़थे रुखुवा टाप।
कखरो ले झन येला खाप।।
-चितवा

47- सुग्घर-सुग्घर आँखी कान।
सिंग इँखर हे सिरतों शान।।
छिटही बुंदी पिंयर पाँव।
नइ पावव तुम एखर छाँव।।
-हिरना

48- सबले उँचहा एखर ठाट।
रेती एखर सोज्झे बाट।
निपटाथे ये नँगते काज।
रेगिस्तान के हरय जहाज।।
-उँटवा

49- बोझा डोहारै ये रोज।
होथे निच्चट सिधवा सोज।।
तपथे तेला लात जमाय।
चिपो-चिपो चोखी चिचियाय।।
-गदहा

50- पानी भुँइयाँ करे निवास।
मछरी कस नइ आवय बास।।
भुँइयाँ मा बस टपटप चाल।
चौमासा मा बाजय गाल।।
-मेचका
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ

सोमवार, 8 मार्च 2021

छत्तीसगढ़ के छत्तीस गौरव ~ 02

माता कौशल्या
                  भारत भर मा माता कौशल्या के एकलौता मंदिर छत्तीसगढ़ मा हे। ये मंदिर हा रायपुर जिला के आरंग तहसील के चंदखुरी गाँव मा स्थित हे। ये मंदिर हा हमर छत्तीसगढ़ के गरब-गुमान हे। ये मंदिर के गर्भगृह मा माता कौशल्या के कोरा मा भगवान राम बालरुप मा हावय। महतारी अउ बेटा के मनमोहना रुप हा भक्तमन के मन ला सोज्झे मोह लेथे। ये मंदिर हा एकठन बड़का तरिया के बीचो-बीच स्थित हावय। एखर जीर्णोद्धार सन् 1973 मा करे गे रहिस। वइसे ये मंदिर के अवशेष सोमवंशी कालीन आठवीं-नौंवी शताब्दी के माने जाथे।
            छत्तीसगढ़ हा भगवान राम के ममा घर हरय। पुरातन समय मा छत्तीसगढ़ ला कौशल प्रदेश कहे जावय। भानुमंत कौशल प्रदेश के राजा रहिन अउ येमन अपन प्रदेश के नाँव मा अपन बेटी के नाँव कौशल्या रखिन। कौशल्या हा बहुते गुणी, ग्यानी, धर्मीन अउ संस्कारी बेटी रहिन। बिहाव के उमर मा कौशल्या के बिहाव अयोध्या के राजा दसरथ ले होइस। कन्यादान के बेरा राजा भानुमंत हा अपन दमांद राजा दसरथ ला आधा राज्य घलाव दीन। राजा दसरथ के तीन रानीमन मा कौशल्या सबले बड़े रानी रहिन। इनला महारानी के पदवी मिलिस। महारानी कौशल्या के बेटा राम अउ बहू सीता रहिन। एखरे सेती माता कौशल्या छत्तीसगढ़ के बेटी अउ भगवान राम जी हा इहाँ के भाँचा। छत्तीसगढ़ मा भाँचा के पाँव परे के सुग्घर परंपरा आज ले चलागत मा हे।
              कौशल्या के गुरु श्रृंगी ऋषि रहिन जौन ला कौशल राज्य के राज्यश्रय मिले रहिस। श्रृंगी ऋषि बड़ ग्यानी-ध्यानी, तपसी साधक रहिन। इँखर आश्रम सिहावा पर्वत उपर रहिस। ये जघा आज घलो छत्तीसगढ़ मा हावय। इहें ले छत्तीसगढ़ के जीवनरेखा महानदी के उद्गम होय हे। कौशल्या हा अपन गुरु के आश्रम मा रहिके वेद, पुराण अउ शास्त्रमन के ग्यान पाइन। कौशल्या बहुते गुणवंतीन रहिन। कौशल्या ला नीतिशास्त्र के गजबे ग्यान रहिस। नीतिशास्त्र उपर येमन मौलिक ग्रंथ के रचना करे हें। बहुते दयालु, सुशील अउ आज्ञाकारी रहिन कौशल्या माता हा। इँखर सुग्घर आदत-व्यवहार के सुग्घर प्रभाव रामजी के व्यक्तित्व उपर पड़िस। राम ला मर्यादा पुरुषोत्तम बनाये मा माता कौशल्या के सीखोना हा काम आये हे।
                घर परिवार अउ समाज ला सुशिक्षित, सभ्य अउ संस्कारी बनाना हे ता बेटीमन ला खच्चित पढ़ावव। इँखर पढ़े-लिखे ले परिवार घलाव शिक्षित होथे। महतारी के शिक्षा-दीक्षा नवा पीढ़ी के भविष्य ला गढ़थे। महारानी कौशल्या हा एक आदर्श पत्नी के संगे-संग एक आदर्श महतारी होय के धर्म निभाइन। महारानी कौशल्या के पढ़ना-लिखना हा इही बताथे के पुरातन काल मा घलो बालिका-शिक्षा ला बहुते महत्व दिये जावत रहिस।
         महारानी कौशल्या हा छत्तीसगढ़ ला गरब करे के मौका दीन। राम जइसन बेटा पाके अयोध्या धन्य होइस अउ भगवान जइसन भाँचा पाके कौशल प्रदेश हा बड़भागी होइस। एक आदर्श नारी अउ आदर्श महतारी के रुप मा महारानी कौशल्या के नाँव हमेशा उच्च स्थान मा रही। महारानी कौशल्या उपर सरी छत्तीसगढ़ ला गरब अउ गुमान हमेशा रहि।
◆●◆●◆●◆●◆●◆●●◆●◆●◆●●●●●
कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के छत्तीस गौरव ~ 01

भक्तिन शबरी माता
                 रामभक्त के रुप मा अपन अलग पहिचान बनइया भक्तिन माता शबरी के ये कथा हमर छत्तीसगढ़ मा प्रचलित हे। वर्तमान जाँजगीर जिला के शिवरीनारायण नगर के रुप मा जग प्रसिद्ध हे जिहाँ महानदी, शिवनाथ अउ जोंक नदी के त्रिवेणी संगम हे। ये जघा हा छत्तीसगढ़ के जगन्नाथ के रुप मा घलो जाने जाथे। येला मतंग ऋषि के गुरुकुल आश्रम अउ शबरी के साधना स्थल माने गे हे। शबरी ला अपन तपस्या के फल मोक्ष रुप मा इहें मिले रहिस। भगवान राम हा इही जघा शबरी के जूठा बोंइर ला खाये रहिस अउ अपन भक्तिन ला तारे रहिस। एखरे सेती ये जघा के नाँव माता शबरी के नाँव उपर शबरीनारायण होगिस। धीरे-धीरे शबरीनारायण के नाँव बिगड़ के शिवरीनारायण होगे। इहाँ शबरी माता के नाँव ले ईंटा ले बने पुरातन मंदिर घलाव हावय।
           माता शबरी के नाँव शबरी नइ रहिस हे। येहा भील जनजाति के राजा के बेटी श्रमणा रहिन। बिहाव के उमर देखके इँखर ददा हा अपन जात के राजकुमार संग श्रमणा के बिहाव तय कर दीन। बिहाव मा बलि दे खातिर छेरी, भेड़ीमन के भीड़ ला देखके राजकुमारी श्रमणा के मन बिचकगे। बिहाव के एकदिन पहिली जम्मों जानवर ला बाहिर खेद के राजकुमारी हा घर ले भगागे। इँखर मन मा वैराग्य उत्पन्न होगे अउ घर नइ लहुटिन। घनघोर जंगल मा भटकत-भटकत आसरा खोजँय अउ शिक्षा-दीक्षा खातिर विनती करँय फेर कोनो तैयार नइ होवँय भील जात के हे जान के। आखिर मा वोला एकठन आश्रम मिलिस जेमा ऋषि मतंग हा अपन चेलामन संग जप-तप करँय। इहें वोला आश्रय मिलिस अउ ऋषि मुनिमन के सेवा-सत्कार मा लग गिस। शबरी के सेवा अउ भक्ति भाव ले ऋषि मतंग बड़ खुश होइस अउ वोला आशीर्वाद दिस के एक दिन ये जघा मा भगवान राम आही अउ तोला मोक्ष देही। एखर बाद मतंग ऋषि स्वर्ग सिधार गिन।
           शबरी के अंतस गंगाजल कस पवित्र अउ ओखर भक्ति पहाड़ कस अडिग। शबरी भगवान राम के अगोरा मा जवान ले बुढ़िया होगिन। शबरी माता कठिन तपस्या के बल मा अपन इंद्रीमन ला अपन वश मा कर लिन। रातदिन भगवान के ध्यान लगावत अपन भक्ति ला पोठ कर डरिन। इँखर भक्ति के पार बड़े-बड़े साधु-संत, महात्मा, ध्यानी-ग्यानीमन नइ पा सकिन। सबके हृदय मा शबरी बर सम्मान अउ आदर बाढ़ते गिस। एकदिन राम अउ लक्ष्मण जी माता सीता के खोज मा शबरी के कुटिया मा हबरगें। शबरी के आँखी अपन प्रभु ला देख के चौंधिया गे। धरारपटा भगवान के सेवा मा जुट गे। अपन आँसू के धार ले भगवान के पाँव ला धो धरिस। जंगल मा खाये खातिर कांदाकूसा भर ही मिलय इही पाय के शबरी हा अपन कुटिया तीर के बोंइर भगवान बर लानिस। मीठ-मीठ बोंइर खवाय खातिर शबरी हा पहिली चीखय फेर भगवान राम ला मीठ फर ला देवय। प्रभु राम घलाव शबरी के प्रेम अउ भक्ति ला देख के सुध गँवाके जूठा बोंइर खाय मा मगन होगिन। अइसन भक्तिन माता शबरी रहिन जौन भगवान ला अपन भक्ति मा बाँध लिन। शबरी के इही भक्ति अउ प्रेम हा आज वोला अमर बना दिस। शबरी ला अपन भक्ति के फल मोक्ष के रुप मा मिलिस।
                      शबरी के सुरता बिना भगवान के नवधा भक्ति हा अधूरा हे। धन्य हे हमर छत्तीसगढ़ जिहाँ अइसन भक्तिन दाई रहिन। सरकार हा शबरी के धाम शिवरीनारायण ला 'राम वन गमन मार्ग' के रुप मा चिन्हारी घलाव करे हे। छत्तीसगढ़ मा भगवान राम हा जिहाँ-जिहाँ वनवास के बेरा मा समय काटे रहिन ओखर चिन्हारी करके वोला जघा ला संजोये के वुता चलत हे।
●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●
कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ़

चंद्रयान अभिमान

चंद्रयान  ले  नवा  बिहान,  हमर तिरंगा, बाढ़य शान। रोवर चलही दिन अउ रात, बने-बने बनही  हर  बात, दुनिया होगे अचरिज आज, भारत मुँड़़ अब सजगे ताज, ...