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मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

दोहा अमित के ~ छंद

002- छंद
छंद सनातन ग्यान हे, काव्य सृजन के प्राण।
छंद, वेद, ऋषि, देवता, करथें जग कल्याण।।

यति, गति, तुक, मात्रा, चरण, अनुशासन के बंद।
जौन सृजन ये होय सब, नाँव ओखरे छंद।।

सुग्घर गति सुर लय सधय, रख ले एखर ध्यान।
विषम विषम सम हा 'अमित', कल संयोजन प्रान।।

शब्द-शब्द ला छाँट के, विधिवत रखव जमाय।
बहुते बढ़िया लय बनय, सरी जगत मोहाय।।

सबो चरण मा देख गिन, एक बरोबर भार।
उही छंद ला जान तैं, सममात्रिक के सार।।

छंद शास्त्र बहुते गहिर, मिलय न एखर थाह।
बनय सिद्ध साधक अमित, जइसन जेखर चाह।।

गद्य कसौटी व्याकरण, काव्य कसौटी छंद।
अनुशासन बँधना सहित, उपजै अति आनंद।।

सजथे सुर लय साधना, छंद सृजन अनमोल।
अमित सनातन गेयता, फूटय सरगम बोल।।

मन के अँधियारी मिटय, देखत छंद अँजोर।
सूरुज निकलै चीर के, अमित घटा घनघोर।।

लिखना हे बड़ कीमती, झन तैं खरही गाँज।
सोच-समझ आखर बउर, पहिली अंतस माँज।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ
गोठबात~9200252055 - (27/04/21)

दोहा अमित के ~ अपन भाखा

महतारी भाखा ~ दुलरवा दोहालरी
अपने भाखा मा करव, अपन हृदय के गोठ।
निज भाखा ले बाढ़ही, आन-बान हा पोठ।।
अपने भाखा के बिना, सबल न कोई होय।
लाख उदिम करले अमित, भला करय नइ कोय।।
निज भाखा उन्नति बसै, सिरतों कहना मान।
अपने भाखा ज्ञान बिन, देंह समझ बिन प्रान।।
महतारी भाखा अमित, होथे ब्रम्ह समान।
छोड़ बिदेशी मोह ला, एखर कर सम्मान।
अपने भाखा बोल मा, का के हावय लाज।
निज बोली भाखा अमित, बने बनावय काज।।
देख बिदेशी ढंग के, धरे सबो ला रोग।
अपन पाँव टँगिया परै, बाढ़य मूरख सोग।।
लोककला संस्कृति अमित, निज भाखा ले बाढ़।
जतके बउरे जाय जब, वतके होवय गाढ़।।
महतारी भाखा हमर, पावय मया दुलार।
छत्तिसगढ़ी भाखा अमित, पहिली पाँव पखार।।
भाखा दरजा देव के, सँउहे हे भगवान।
करही जे सेवा जतन, ओखर हे कल्यान।।
अंतस ले अंतस जुड़य, होवय मन के बात।
भाखा प्रगटे भाव निज, कोनो कहाँ लुकात।।
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कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ
गोठबात ~ 9200252055 - (27/04/21)

दोहा अमित के ~ सावन भादो

सावन भादो घात

बिजली चमकै जोर ले, सावन भादो घात।
बरसै बरसा झूम के, झड़ी करय दिनरात।।

झड़ी करय दिनरात तब, हरियर खेती खार।
रदरद-रदरद पानी गिरै, अमरित अमित अपार।।

अमरित अमित अपार हे, जीव जगत के सार।
बिन बरसा बस बुजबुजा, धरती बिकट बँबार।।

धरती बिकट बँबार ले, जरै जीव के खेल।
मुचमुच हाँसय जीवमन, गिरथे पानी पेल।।

गिरथे पानी पेल ता, सबके मन हरसाय।
तरिया नरवा नल कुआँ, बइहा बन बउराय।।

बइहा बन बउराय सब, तन-मन होय मँजूर।
आये ले चउमास के, भागय आलस दूर।।

भागय आलस दूर जी, होवँय सबो सचेत।
मुँहीं टार ला बाँधथें,  खेती खुर्रा खेत।।

खेती खुर्रा खेत मा, खुरपी खुरमी खास।
खपगे खुरहट खोचका , खलबल ले चउमास।।

खलबल ले चउमास हे, बरसत खुशी बरात।
चहकय चिरई चिंगरी, सावन भादो घात।।

सावन भादो ले जुड़े, सरी जगत के काज।
हाथ जोड़ विनती अमित, कभू गिरय झन गाज।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ

जानव जनऊला~(201-250)

201- चुकिया जइसे रेंगत बेर।
बइठे हे तब दीया ढेर।।
बोहे रहिथे तन के भार।
एखर बिन नइ हे निस्तार।।
-माड़ी

202- जंगल झाड़ी बीच निवास।
जब-जब ये हा मरय पियास।।
पीयय पानी लाले लाल।
तुरतुर-तुरतुर चलथे चाल।।
-जुआँ

203- आवय एक न येला आँच।
भुसभुस बन मा नाचय नाँच।।
ककवा ककई ले डर्राय।
लीम तेल ले प्रान बचाय।।
-जुआँ

204- राहय तरिया बीचो बीच।
जइसे गोबर चोता कीच।।
पखरा जानव एखर खोल।
जल्दी एखर नाँव ल बोल।।
-कछुआ

205- मुँहु हे चाकर दाढ़ी लाम।
मेर्र-मेर्र बस दिनभर काम।।
खावय भारी बोंइर पान।
बहुते सिधवा येला जान।।
-बोकरा

206- अइसन चिरई जानव आज।
अपन पाँव ले आवय लाज।।
पूछी मा पइसा पहिचान।
जंगल के ये होथे शान।।
-मंजूर

207- चटर-चटर हे चतुरा चंट।
भनभन-भनभन देत करंट।।
चूमय थोरिक चुप्पे गाल।
हो जावय तब बारा हाल।।
-मच्छर

208- आवय डॉक्टर बिना बलाय।
बिन पइसा ले सुजी लगाय।।
हाथ-पाँव छैठन हे देख।
नाँव काय हे चिटिक सरेख।।
-मच्छर

209- दू अण्डा अउ एक्के थार।
अलग-अलग हावय व्यवहार।।
हे इक ठण्डा दूजा गर्म।
जानव का हे एखर मर्म।।
- सूरुज, चंदा

210- आगी अँगरा लाले लाल।
लकठा जाबे बारा हाल।।
सात घोड़वा रथे सवार।
पावय कोनो नइ तो पार।।
-सूरुज

211- घटथे बढ़थे एखर रूप।
कभू अँजोरी कभू कुलूप।।
जुड़हा जानव एखर छाँव।
आसमान हे एखर गाँव।।
-चंदा

212- थारी भर मोती भरमार।
खाल्हे कोनो गिरय न यार।।
दिखय न एक्को ये दिनमान।
जगजग रतिहा नवा बिहान।।
-चंदैनी

213- नंद बबा के नौ सौ गाय।
चरय रात, दिन बेड़े जाय।।
सुग्घर जुड़हा एखर धाम।
ओझल होथे देखत घाम।।
-चंदैनी

214- रहिथे येहा तरिया बीच।
गड़े नेरवा खाल्हे कीच।।
दिखथे जइसे कंचन थार।
लोटय पानी एक न यार।।
-पुरईन पान

215- एती-ओती जावय रोज।
कहाँ धराथे येहा सोज।।
आगू-पाछू चलथे संग।
बिरबिट करिया एखर रंग।।
-छँइहा

216- बादर ले नरियर ये आय।
पाँच रकम के भेला ताय।।
बिन छाली के हावय बीज।
बोल तुरत अब ये का चीज।।
-करा

217- सावन-भादो भारी चाल।
पानी-पानी बारा हाल।।
माँघ-पूस मा पातर धार।
का हे येहा करव विचार।।
-मोरी (नाली)

218- भर-भर हथुआ धरे पिसान।
घर भर बाँटय अपने मान।।
एखर बिन नइ हे उजियार।
संग रहय ता खुशी अपार।।
-अँजोर

219- आधा मिट्ठू देखव यार।
आधा बगुला दिखथे सार।।
हमर देश मा उपजै पोठ।
कोनो पातर कोनो मोंठ।।
-मुरई

220- रिंगी-चिंगी फूलै फूल।
फर फरथे फुनगी मा झूल।।
दिखथे लकड़ी जइसे अंग।
गुदा रसा हे एखर संग।।
-मुनगा

221- दाना ऊपर दाना देख।
इचिक-पिचिक हे तहूँ सरेख।।
गोल-गोल दाना दमदार।
बने रथें एक्के परिवार।।
-बटरा

222- एक खड़े खंभा खँड़सार।
छानी छाहित एखर चार।।
नाँव धरे हें तीने पान।
भरे स्वाद हे येमा जान।।
-तिनपनिया

223- एक टाँग के टोपी एक।
जोगी निकले बारा नेक।।
बादर गरजय तब ये आय।
सबके मन ला बहुते भाय।।
-फुटु

224- हावय हड़िया सादा रंग।
भीतर पानी हे दू रंग।।
तुरते ताही नाँव बताव।
बाँट बिराजे सब झन खाव।।
-अंड़ा

225- देवय दुधवा नो हे गाय।
तीन आँख पर नहीं शिवाय।।
रहै पेड़, चिरई नइ जान।
खड़भुसरा एखर पहिचान।।
-नरियर

226- रहय कटोरा संगे खाप।
गोरा बेटा साँवर बाप।।
भीतर कोंवर, बाहिर ठोस।
गुरतुर-गुरतुर खाव परोस।।
-नरियर

227- साल महीना चूरे भात।
जब खाबे तब ताते तात।।
नानुक फर हे करय कमाल।
छू पारे ता आँखी लाल।।
-मिरचा

228- लइकापन हरियर हे हाल।
आय बुढ़ापा होवय लाल।।
मया मरे मा अगिन ढिलाय।
पानी-पानी सब चिल्लाय।।
-मिरचा

229- हरियर पींयर एखर रंग।
टिटटिप रस हा छलकै अंग।।
नान्हें-नान्हें सेसा सार।
काट-काट के चटनी डार।।
-लिम्बू

230- थोरिक पानी बीच तलाव।
लाल भवानी गाल फुलाव।।
धोय नहाये ताते तात।
कहाँ अगोरा खाते खात।।
-सोहाँरी

231- नानुक टूरा मटकू दास।
ओन्हा परिहे तीस पचास।।
लाली सादा रहिथे यार।
चुरपुर गुरतुर नँगते झार।।
-गोंदली(प्याज)

232- फर लड़ुवा कस होथे गोल।
पाना गुजगुज लाम टटोल।।
हाँसय येहा, सबझन रोय।
कांदा भुँइयाँ भीतर होय।।
-गोंदली(प्याज)

234- बोंवत बटुरा देखँव खार।
जामत मा दिखथे कुसियार।।
ढाई महिना होवय पूत।
दाढ़ी मेछा होय अकूत।।
-जोंधरी(भुट्टा)

235- एक पेड़ मा ढेलच-ढेल।
खावँय लइका खेलत खेल।।
कटही डारा पाना पीक।
सावन मा ये लागय नीक।।
-बेल पेड़

236- खाल्हे हंडा मिलय हियाव।
ऊपर हँड़िया देखव पाव।।
पाना डारा बनथे साग।
अमसुरहा के धरलव पाग।।
-जिमीकांदा

237-  सौ-सौ घुँघरू एक्के गोड़।
हवय गोरिया ये बेजोड़।।
खनखन बाजय, सुनलव टेर।
बोलव का झन करव अबेर।।
-मूँगफली

238- बारी बखरी खेती खार।
ओन्हा-कोन्हा तीरे तार।।
एक फूल बहुते सुखदास।
फर फरथे चालीस पचास।।
-केरा

239- तीन सींग के करिया गाय।
अब्बड़ एखर दूध मिठाय।।
रायह येहा तरिया बीच।
डेरा एखर कारी कीच।।
-सिंघाड़ा

240-  काय शहर अउ गँवई गाँव।
जम्मों करथें खाँवे खाँव।।
फर करिया अउ गुठलु सफेद।
कोनो करँय न काँही भेद।।
-जामुन

241- कुबरा बुढ़वा नून म खाय।
सोज बाय नइ रहि पाय।।
करिया बीजा हरय चिचोल।
सोच समझ के नामे बोल।।
-अमली

242- सुग्घर हावय गोल मटोल।
हरियर डारा लाल कपोल।।
चटक-मटक ये सबके संग।
कभू करय नइ ये उतलंग।।
-पताल

243- अइसन सिधवा राजा घात।
बइठे छानी ताने लात।।
भुँइयाँ लामे एखर हाथ।
फुलुवा पाना देथे साथ।।
-मखना नार

244- चार महीना खूब भराय।
चार महीना रहि खलियाय।
चार महीना धूल उड़ाय।।
चार महीना सब घोलाय।।
-खेत

245- दाई चबरी बेटी नेक।
रहिथें काँटा खूँटी टेक।।
जौन तीर मा एखर जाय।
संग चिरोंजी सुग्घर पाय।।
-बोंइर

246- एक दाँत के डउका लोग।
सावन-भादो नइ हे सोग।।
एक मुठा मा थामै मूँठ।
दू बइला हा फाँदै ठूँठ।।
-नाँगर

247- रुखराई ना पाना सार।
ऊपर छाहित छाता यार।।
चढ़े रखे ये उँचहा रूख।
बिन खाये ये मेटे भूख।।
-अमरबेल

248- बिना पाँव के अहिरा जाय।
बिना सींग के देखव गाय।।
देख अचंभा मति चकराय।।
येमन खारे खार कुदाय।।
-साँप अउ मेंचका

249- बिना पाँख के सुवना खास।
उड़ि-उड़ि जावय ऊँच अगास।।
रंग रूप के नइ हे आस।
भूख मरै ना कभू पियास।।
-जीवात्मा

250- कथा सुपारी बँगला पान।
दू मनखे अउ बाइस कान।।
कभू करँय लंका मा राज।
रहिगे अब तो सुरता आज।।
-रावण, मंदोदरी
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ
गोठबात-9200252055, सृजन-27/04/21

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

जानव जनऊला~(151-200)

151- बँधे सघन के बँधना बाँध।
कोरे गाँथे झूलय खाँध।।
चाबै नहना नइ जानै तेन।
मजा उड़ावय जानै जेन।।
-ककई

152- अँइठे गँइठे हवय हजार।
बइठै चढ़के ऊँच पहार।।
चघे फूल अउ पतई पान।
फेर देवता नो हे जान।।
-पगड़ी

153- सेतचंद हे राजाराय।
भुँइयाँ ना येला उपजाय।।
मुँहू फोकला एक न पाय।
लाखों फर ला सइघो खाय।।
-करा

154- तन के फुदकी फुदकत जाय।
नौ-नौ अँड़वा पार मढ़ाय।।
धागा संगे बदे मितान।
अरझे दूनों के हे प्रान।।
-सुई (सिलाई)

155- एक अचंभा देखन भाय।
खाय न खाना, जाय सुखाय।।
खावय खाना तब मोटाय।
सदा सुखी हे जे पतियाय।।
-चून्दी

156- चाहे कतको संकट आय।
सबके जरथे ता जर जाय।।
साधु बबा के बचै लँगोट।
काँपय न कभू एखर पोट।।
-सड़क

157- कच्चा मा ये गुदगुद गाँठ।
पक्का मा ये होथे टाँठ।।
चलै चाक पावय आकार।
पानी पीयँय तब संसार।।
-मरकी

158-  गर मा डोरी हावय लाम।
कारी छेरी परगे नाम।।
चल टूरी चल हाट बजार।
तोर बिना कइसे बैपार।।
-तराजू

159- खिलय न कोनो राजा बाग।
एखर ले चमकै जग भाग।।
जस गुलाब बिहना मुस्काय।
बड़े बिहनिया ये बगराय।।
-बेरा

160- बजत नँगारा चारों खूँट।
भागँय पल्ला छेरी ऊँट।।
खड़े लखन के बरदी खार।
दाता एखर हे रखवार।।
-सूरुज, चंदा, चंदैनी, गरजना

161- ठड़गा बइला ठड़गा सींग।
ठड़गा नाचै टींगे टींग।।
भर-भर मुँह ठाड़े पगुरात।
बुता करय जब खावय लात।।
-ढ़ेकी

162- नानुक बटकी रस भंडार।
रामा आगू पलथी मार।।
एक कटोरी रसपान।
कच्चा पक्का डार अथान।।
-लिम्बू

163- आठ पहर भर अँगना तीर।
चौंसठ पल ये खड़े गँभीर।।
नर के ऊपर चढ़हे नार।
होवत हे जग मा जयकार।।
-तुलसी

164- जनम धरे तब गज हे साठ।
भरे जवानी एक लुवाठ।।
आय बुढ़ापा मा गज तीस।
तुरत बतावव काय जिनीस।।
-छँइहा

165- दू पूछी अउ छै ठन कान।
गोड़ा दस हे एखर जान।।
हावय सिरतों मा मुँहु चार।
बिना जीभ के हाथ पसार।।
-दुहना

166- खन-खन उड़ते-उड़ते जाय।
बइठै भीतर पंख बिछाय।।
लाखों जियना मार गिराय।
पर ये कुछु नइ कखरो खाय।।
-केंवट के जाली

167- बाप पूत के एक्के नाँव।
राहँय दूनों एक्के ठाँव।।
हवय नाँव नाती के और।
जभे बताबे जाबे ठौर।।
-मँउहा

168- कोन तीर मा तरई गाय।
मुँह भर ये ओन्हारी खाय।।
बीच पेट मा सबके ध्यान।
पूजँय पहिली देव समान।।
-जाँता

169- घोड़ा ऊपर घोड़ा संग।
जीन घोड़वा एक्के रंग।।
एक दुसर के पीठ सवार।
जावय सँघरा हाट बजार।।
-रउतईन कीरा

170- बन मा काटय, बन मा छील।
सावन भादो नँदिया ढील।।
काट बहेरा बन म सुखाय।
जइसे फाँफा छोड़े जाय।।
-डोंगा

171- एक पेड़ के अजब सुभाव।
लगे देंह मा बारा घाव।।
तीस-तीस के झोत्था डार।
अलग-अलग हे नाँव पुछार।।
-साल, महीना, दिन

172- फरै लकड़िया उँचहा डार।
पोर-पोर मा गुण रसधार।।
खाँय सियनहा चाँटे चाँट।
छेवरिया ला देवव बाँट।।
-मुनगा

173- मोर ममा के नौ सौ गाय।
रतिहा ढिल्ला बड़ बिजराय।।
चारा-पानी कुछु नइ खाय।
बिहना लहुटे घर मा आय।।
-चंदैनी

175- तीन भाग हे, चलय समेट।
खावय कतको खलखल पेट।।
दिखथे गाभिन पूछी कोर।
रेंगय तुरतुर ओरी ओर।।
-करिया चाँटा

176- चमचम चमचम पाँव मड़ाँव।
तोर दुवारी हेरत आँव।।
जाँवर जोड़ी धौंस जमाय।
अँकड़ा कोई काम न आय।।
-पनहीं

177- तरी तेलई ताते तात।
एक तेलई ऊपर थात।।
बड़े मिठाई चूरे जाय।
सादा-कोंवर गंज मिठाय।।
-पेंउस

178- माटी के बकरा नरियाय।
चटकन चीला चटचट खाय।।
जतके परथे येला मार।
वतके बनथे ये गुणकार।।
-माँदर

179- बिना हाथ के करय उपाय।
बिना गोड़ के खाँधे जाय।।
घोड़ा दाबे बोलय धाँय।
मुँह ले बोली निकलै साँय।।
-बंदूक

180- दिखे साँप कस एखर ढंग।
दुधवा सादा उज्जर रंग।।
नारी गर के शोभा आय।
जानय जौने तुरत बताय।।
-सुतिया (सूँता)

181- सुक्खा डबरी तीपत जाय।
देख कोकड़ा ह फड़फड़ाय।।
सबके मन ला बहुते भाय।
मुसुर-मुसुर सब येला खाय।।
-मुर्रा

182- सात नँगरिया जोते खेत।
पानी के नइ पावय नेत।।
ठाडे़ जोगी ध्यान लगाय।
बिना बोकला रुखुवा पाय।।
-मंदिर

183- नान्हें लइका चतुरा चंट।
दिखथे ये भारी फरजंट।।
मुँह ले बाहिर दतुवन घीस।
तुरत बतावव काय जिनीस।।
-चूल्हा

184- माटी के बइला हे जान।
माटी के हे चढ़े पलान।।
माढ़ै माटी के देवान।
झटपट तैं येला पहिचान।।
-हाँड़ी

185- बादर ले गिरय अकाय।
तेला लेंगय लोग उठाय।।
स्वाद पचर्रा अजब जनाय।।
जे खावय वो हा पछताय।।
-करा (ओला)

186- इन्दर राजा फोरै पेट।
बादर गड़गड़ देवय मेट।।
बीच बोडर्री निकलै भात।
बनय तभे जी सबके बात।।
-कपसा

187- ना डारा ना कोनो पान।
जनम धरे हन तबले ध्यान।।
खाय बिना रहे न जाय।
जिनगीभर रहना हे खाय।।
-नून

188- बाढ़य बइला, भागय गाय।
खेत खार मा गोड़ लमाय।।
आगू-आगू फुलुवा फूल।
आँखी-आँखी जावय झूल।।
-मखना नार

189- पर्रा भर हे लाई देख।
बगरै मा नइ सकय सरेख।।
चमकै चमचम ये हा रात।
होत बिहनिया गायब बात।।
-चंदैनी

190- छितका कुरिया बाघ बँधाय।
चारा देबे बड़ गुर्राय।।
खावय खानी देंह घुमाय।
कतको खाथे, कहाँ अघाय।।
-जाँता

191- जेखर ऊपर पाँखी झार।
चना मसूरी खेती खार।।
डोंगा बूड़य पानी बीच।
कभू-कभू पानी मा कीच।।
-आँखी

192- पचरी ऊपर पचरी जान।
रहय मोंगरी परे उतान।।
हावय कोंवर मासे मास।
नान्हें हे पर हावय खास।।
-जिभिया

193- हवय टेड़गा एखर राह।
जबर कुआ, नइ पावय थाह।।
आँखी संग म जोड़ी जोड़।
जइसे हावय हाथे गोड़।।
-कान

194- जनमै येहा घामे घाम।
चमचम चमकै आगर चाम।।
छँइहा मा ये झट मुरझाय।
लगय हवा ता मरते जाय।।
-पछीना

195- राहँय जम्मों एक्के संग।
पाँचों भाई एक्के रंग।।
अलग-अलग मा काय कहाय।
सँघरा मा ये सदा सहाय।।
-हथेरी

196- करिया हे पर नो हे काग।
लम्बा हे पर नो हे नाग।।
चढ़ै तेल, नो हे हनुमान।
चढ़ै फूल, नो हे भगवान।।
-बेनी

197- उचकुल-गुचकुल कुआँ खदान।
पेड़ बतीसा, एक्के पान।।
रहय मोंगरी मछरी एक।
सबके सेवा करथे नेक।।
-मुँह, जीभ

198- बिना कहे ये लग जाय।
कहे-कहे मा ये तनियाय।।
लाली-लाली तीर कमान।
रहिथें दूनों एक समान।।
-होंठ

199- दू दरवाजा मंदिर एक।
भुरुवा राजा राहय नेक।।
अलग-अलग हे एखर भेद।
भीतर जाके एक्के छेद।।
-नाक

200- नँदिया के ये तीरे तीर।
बइठे बगुला धीरे धीर।।
टुपटुप येहा बिनते जाय।
जुरमिल के ये जम्मों खाय।।
-दाँत
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कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ
9200252055 ~ सृजन-26/04/2021

चंद्रयान अभिमान

चंद्रयान  ले  नवा  बिहान,  हमर तिरंगा, बाढ़य शान। रोवर चलही दिन अउ रात, बने-बने बनही  हर  बात, दुनिया होगे अचरिज आज, भारत मुँड़़ अब सजगे ताज, ...