यह ब्लॉग खोजें

शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

हमर देश के सेना~आल्हा छंद

हमर देश के सेना (आल्हा छंद)

हमर देश के सेना देखव, भारी बलकर बल के खान।
सीमा के रक्छा खातिर इन, धरे हाथ मा अपने प्रान।।

बैरी तुम झन सिधवा समझव, हमर सेनानी यम के काल।
जीभ सुरर के घेंच पूजथें, भरथें भूँसा निछथें खाल।।

घाम-जाड़ अउ बरसत पानी, सीमा के इन करँय सरेख।
थरथर काँपय दुश्मन लिज्झड़, तरफर तारारोसी देख।।

खरतरिहा खरखर बड़ खर्रा, येमन बैरी बर खखुवाँय।
फरफर फरकय भुजबल बहुते, देखत मा दुश्मन भकवाँय।।

भारत माता के जय बोलँय, सँघरा जइसे शेर दहाड़।
सुनके दुश्मन पल्ला भागँय, देही नइ तो भुजा उखाड़।।

खाँध जोर जब सेना चलथे, लागय जइसे हवा-गरेर।
सउँहत दिखथे काल बरोबर, लगथें कोनो भँवर मछेर।।

बरसय जब इन बैरी उप्पर, धरके गोला अउ बंदूक।
पानी के बूड़े नइ बाचँय, देथें झट जर सुद्धा फूँक।।

ठाँव-ठाँव मा बाधा बइठे, जंगल-झाड़ी, नदी-पहाड़।
डहर कठिन नइ काँही जानय, कोनो नइ कर सकँय बिगाड़।।

सरदी-गरमी, बरसत बादर, रक्षा मा इन राहँय ठाढ़।
देख-देख के धजा तिरंगा, लहू-पछीना होवँय गाढ़।।

भारत भुँइया प्रान अधारा, सबले बड़के मानँय देस।
गलत करइया मनखे ला इन, भरभर भुर्री कस दँय लेस।।

कायर-कपटी, खोड़िलमन ला, भेजँय इन यमलोक सकेल।
जौनै देखँत नजर गड़ा के, ओखर आँखी बाँटी खेल।।

भारत के इन बघवा बेटा, धरथे गजबे मन मा धीर।
बरजे ले नइ मानय बैरी, तब देवँय धर ठाढ़े चीर।।

हितवा खातिर हितवा-सिधवा, बैरी बर हें डोमी साँप।
महाकाल कस काल बरोबर, देखय बैरी पोटा काँप।।

भारत के सैनिकमन सिरतों, हावँय जब्बर वीर सपूत।
महतारी के सेवा खातिर, जान लड़ावँय 'अमित' अकूत।।

कन्हैया साहू 'अमित'~ भाटापारा छत्तीसगढ़ ©®
●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●●◆●◆

रविवार, 22 अगस्त 2021

सार छंद मा गीत

*सार छंद गीत ~ मोर मयारू भैया*

जुग-जुग जीबे जग मा तैंहा, मोर मयारू भैया।
हवच तहीं हा ये दुनिया मा, सिरतों मोर पुछैया।।

तोर बिना घर सुन्ना लागै, अंतस छाय हदासी।
भाँय-भाँय बड़ गाँव-गली हा, आवय बस रोवासी।।
भेजत हावँव राखी तोला, हमरे देश रखैया।
जुग-जुग जीबे जग मा तैंहा, मोर मयारू भैया।....

सावन पुन्नी राखी आथे, ढरथे  आँसू आँखी।
मन करथे उड़ जाँव तोर तिर, लगा देंह मा पाँखी।।
सुरता आथे बीते दिन हा, छिन-छिन संग लड़ैया।
जुग-जुग जीबे जग मा तैंहा, मोर मयारू भैया।....

बाढ़ै जश बड़ तोर रात दिन,, गड़य न पाँव म काँटा।
दुख-पीरा चिटको झन आवै, चाबय कभू न चाँटा।
मोर उमर लग जावय तोला, सब बर मया मरैया।
जुग-जुग जीबे जग मा तैंहा, मोर मयारू भैया।....
हवच तहीं हा ये दुनिया मा, सिरतों मोर पुछैया।।

*कन्हैया साहू 'अमित'*✍
भाटापारा छत्तीसगढ़ ©®

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

छत्तीसगढ़ी वर्णमाला कविता मा

छत्तीसगढ़ी वर्णमाला ~ बाल कविता
●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●●◆●◆

अ से अमली बड़ अमटाहा।
आ से आमा  खा मनचाहा।।
इ से   इब्भा  मार  भगावौ।
ई से   ईंटा   महल  बनावौ।।

उ से उरिद बरा हम खाबो।
ऊ से ऊँटवा मा चढ़ जाबो।।
ए से  एड़ी  चिक्कन राखौ।
ऐ से  ऐना  मनभर झाँकौ।।
ओ से ओली मा  तरकारी।
औ से औरतमन महतारी।।

क से कड़ही गजब मिठाथे।
ख से  खपरा  छानी  छाथे।।
ग से  गगरी  पानी  भर  ले।
घ से  घर तैं सफ्फा कर ले।।

च से चटनी बासी खा ले।
छ से  छइहाँ मा सुरताले।।
ज से जरई  जामत  हावै।
झ से झगरा नइ तो भावै।।

ट से   टहलू   हाँका   पारै।
ठ से  ठलहा  फाँकी  मारै।।
ड से डबिया  कोन भुलाये।
ढ से  ढकना  ढाँक मढ़ाये।।

त से तरिया डुबक नहाबो।
थ से थरहा  धान  लगाबो।
द से  दरपन सब ला भाथे।।
ध से धनिया बड़ ममहाथे।
न से  नदिया   पूरा   आथे।।

प से  पखना  होथे  भारी।
फ से  फरा  संग  सोंहारी।
ब से  बइला  ललहूँ  धौंरा।।
भ से भजिया एक्के कौंरा।
म से  मचिया  माढ़े  चौंरा।।

य से  यश तैं पोठ कमाले।
र से  रखिया  नार चढ़ाले।।
ल से लइका  लाड़ू  खाही।
व से  वरदी  जँचे  सिपाही।।

स से  सरई  पेड़  बचावौ।
श से शक्कर कमती खावौ।।
ष से  षट ला गिनथें सब छै।
ह से  हलधर  के  होवय जै।।

रचना- कन्हैया साहू 'अमित'
शिक्षक-भाटापारा छत्तीसगढ़
गोठबात ~ 9200252055
●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●

सोमवार, 26 जुलाई 2021

हम देश के सेना ~ आल्हा छंद

हमर देश के सेना ~ आल्हा छंद

हमर देश के सेना देखव, भारी बलकर बल के खान।
सीमा के रक्छा खातिर इन, धरे हाथ मा अपने प्रान।।

बैरी तुम झन सिधवा समझव, हमर सेनानी यम के काल।
जीभ सुरर के घेंच पूजथें, भरथें भूँसा निछथें खाल।।

घाम-जाड़ अउ बरसत पानी, सीमा के इन करँय सरेख।
थरथर काँपय दुश्मन लिज्झड़, तरफर तारारोसी देख।।

खरतरिहा खरखर बड़ खर्रा, येमन बैरी बर खखुवाँय।
फरफर फरकय भुजबल बहुते, देखत मा दुश्मन भकवाँय।।

भारत माता के जय बोलँय, सँघरा जइसे शेर दहाड़।
सुनके दुश्मन पल्ला भागँय, देही नइ तो भुजा उखाड़।।

खाँध जोर जब सेना चलथे, लागय जइसे हवा-गरेर।
सउँहत दिखथे काल बरोबर, लगथें कोनो भँवर मछेर।।

बरसय जब इन बैरी उप्पर, धरके गोला अउ बंदूक।
पानी के बूड़े नइ बाचँय, देथें झट जर सुद्धा फूँक।।

ठाँव-ठाँव मा बाधा बइठे, जंगल-झाड़ी, नदी-पहाड़।
डहर कठिन नइ काँही जानय, कोनो नइ कर सकँय बिगाड़।।

सरदी-गरमी, बरसत बादर, रक्षा मा इन राहँय ठाढ़।
देख-देख के धजा तिरंगा, लहू-पछीना होवँय गाढ़।।

भारत भुँइया प्रान अधारा, सबले बड़के मानँय देस।
गलत करइया मनखे ला इन, भरभर भुर्री कस दँय लेस।।

कायर-कपटी, खोड़िलमन ला, भेजँय इन यमलोक सकेल।
जौनै देखँत नजर गड़ा के, ओखर आँखी बाँटी खेल।।

भारत के इन बघवा बेटा, धरथे गजबे मन मा धीर।
बरजे ले नइ मानय बैरी, तब देवँय धर ठाढ़े चीर।।

हितवा खातिर हितवा-सिधवा, बैरी बर हें डोमी साँप।
महाकाल कस काल बरोबर, देखय बैरी पोटा काँप।।

भारत के सैनिकमन सिरतों, हावँय जब्बर वीर सपूत।
महतारी के सेवा खातिर, जान लड़ावँय 'अमित' अकूत।।

कन्हैया साहू 'अमित'✍
भाटापारा छत्तीसगढ़ ©®
●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●●◆●◆

सोमवार, 7 जून 2021

जानव जनऊला ~ (1051-1100)


1051- नोनी-बाबू खेलँय जान।
खंभा दू गाड़ै मैदान।।
आठ खिलाड़ी टीम बनाय।
भागय तेला छू दँउड़ाय।।
-खो-खो

1052- भुँइया मा ये खेले जाय।
दाँव सुघर दू दल देखाय।।
सात खिलाड़ी एक्के पार।
जौन छुवावै ओखर हार।।
-कबड्डी

1053- फुदुक-फुदुक ये खेले जाय।
उँखरू बइठे पाँव चलाय।।
नोनीमन ला बहुते भाय।
चिटिक जघा मा काम चलाय।।
-फुगड़ी

1054- दू दल येमा खेलय जान।
भर-भर साँसा गावँय गान।।
गावत खानी साँसा टूट।
होवय बाहिर, जावय छूट।।
-खुड़वा

1055- गेंद न बल्ला येमा जान।
बस चाही खुल्ला मैदान।।
लकड़ी नान्हें छोल बनाय।
डंड़ा मारय दाम पदाय।।
-गिल्ली डंडा

1056- एक पाँव मा उछले जाय।
डब्बा-डब्बा डाँड़ खिंचाय।।
खपरा, पखरा कुटका लान।
मुक्का-बोली खेलय जान।।
-बिल्लस

1057- डब्बा बनथें येमा चार।
खपरा कुटका खेल म सार।।
पाँच गड़ी मिल खेलँय खेल।
हार जीत के सुग्घर मेल।।
-फल्ली

1058- लकड़ी छोले गोल बनाय।
खाल्हे कोती खिला धराय।।
फरिया बर नेती बनवाँय।
फेंक पटक के खूब चलाँय।
-भौंरा

1059- होथे चीनी या ते काँच।
खेलँय लइका गड्डा खाँच।।
गिनथें सब दस बीस पचास।
जेखर जल्दी सौ वो पास।।
-बाँटी

1060- लइका बइठैं गोल बनाय।
दाम पदे वो बाहिर जाय।।
पटका धरके रहे लुकाय।
कखरो पाछू जाय मढ़ाय।।
-फोदा

1061- डारा पाना जम्मों लाल।
कोंवर भाजी करय कमाल।।
कमी लहू के पूरा होय।
विटामीन 'सी' बहुते सोय।।
-लाल भाजी

1062- चिक्कन-चिक्कन एखर पान।
येमा गुण के भरे खदान।।
राँधव भाजी आलू डार।
खावव सुग्घर दार बघार।।
-पालक भाजी

1063- चउमासा मा उपजै झार।
पान केंवची एखर सार।।
बिन पइसा के येला पाव।
बड़ गुणकारी, खच्चित खाव।।
-चरौंटा भाजी

1064- बहुते मँहगी होथे जान।
उँचहा भाजी उँचहा शान।।
होय पेड़ के पाना फूल।
फागुन मा ये आथे झूल।।
-बोहार भाजी

1065- रहिथे पानी जिहाँ भराय।
उँहचे छछले बहुते जाय।।
पाना डारा आवय काम।
गजब मिठाथे, जानँव नाम।।
-करमत्ता भाजी

1066- अमसुरहा अम्मट भरमार।
कोंवर पाना फर हे सार।।
भरे आयरन बड़ गुणकार।
फर के चटनी, सुकसा सार।।
-अमारी भाजी

1067- कटही पाना हे पहिचान।
हावय येमा गुण के खान।।
जाड़ा मा ये बहुते आय।
गुणकारी हे, दुनिया खाय।।
-कुसुम भाजी

1068- नइ तो कोनो हा उपजाय।
नँदिया तीर मा बहुते छाय।।
पेट रोग जब बहुत सताय।
खच्चित ये भाजी ला खाय।।
-गुमी भाजी

1069- चउमासा अउ जाड़ म आय।
कोंवर पाना साग बनाय।।
गिल्ला जुड़हा जघा म होय।
दुनिया स्वाद म एखर खोय।।
- तिनपनिया भाजी

1070- नान्हें झाड़ी येला जान।
खाथे कोंवर डारा पान।।
बनय मसलहा, अम्मट डार।
दार अमारी राँध सँघार।।
-चेंच भाजी

1071- भुँइया भीतर कांद कहाय।
ऊपर पाना बाँस सुहाय।।
चाय, साग मा डारे जाय।
चुरपुर पर गुणकारी आय।।
-आदा

1072- ऊपर पाना झाफर होय।
भुँइया भीतर काँदा सोय।।
दिखथे पींयर लकड़ी गाँठ।
भुरका करथें, पिसथें टाँठ।।
-हरदी

1073- गंजी मा पानी डबकाय।
शक्कर, आदा, दूध मिलाय।।
डारँय करिया भुरका पान।
फूँक-फूँक के पियै जहान।।
चाय

1074- घर अँगना मा चौंरा पाय।
नान्हें बिरवा बढ़ते जाय।।
फूल मंजरी पान सहाय।
गजब गुणी ये पौध कहाय।।
-तुलसी

1075- बारी बखरी उपजे जाय।
पाना पिस के चटनी खाय।।
महर-महर बड़ ये ममहाय।
येहा मुँहुँ के बास भगाय।।
-पदीना

1076- कथा महाभारत के गाय।
धरे तमूरा मंच म जाय।।
कौरव पांडव बात बताय।
लोकरंग मा रहे रँगाय।
-पंडवानी

1077- जैतखाम ला माथ नवाय।
गुरु घासी के कथा सुनाय।।
नाचँय माँदर, झाँझ बजात।
सत के सुग्घर बात बतात।।
-पंथी

1078- चइत कुँवारे मा नवरात।
देवी सेवा गीत सुनात।।
माँदर, ढ़ोलक, झाँझ बजाय।
दाई महिमा गाय सुनाय।।
-जस गीत

1079- करम करे के देवय सीख।
करौ मेहनत, झन लव भीख।।
इही भाव ले खुशी मनाँय।
गोल घेर सब नाचैं गाँय।।
-करमा

1080-  लोक गीत के रानी आय।
मया पिरित के गोठ सुनाय।।
काम बुता के संगे संग।
नाच-गान ये जिनगी रंग।।
-ददरिया

1081- अपन जँहुरिया मिल सकलाय।
माटी मिट्ठू बीच बिठाय।।
सज-धज सुग्घर गोल बनाय।
पिट-पिट ताली गीत सुनाय।।
-सुवा गीत

1082- देवारी के दिन जब आय।
राउत भाई सब सकलाय।।
सजे-धजे बड़ खुशी मनाय।
दोहा लउठी धरे सुनाय।।
-राउत नाचा

1083- चउमासा मा गजबे गाँय।
आल्हा-ऊदल कथा सुनाँय।।
नस-नस मा ये जोश जगाय।
लोककथा ये सब ला भाय।।
-आल्हा

1084- गौरा-गौरी मुरत बनाय।
बर बिहाव के नेंग मढ़ाय।।
फूल कुचरना पहिली आय।
सुग्घर उत्सव, गीत सुनाय।।
-गौरा गीत

1085- चुलमाटी, मड़वा जब छाय।
देवतला अउ तेल चघाग।।
नेंग भड़ौनी भाँवर होय।
बेर बिदाई, जम्मों रोय।।
-बिहाव गीत

1086- जनम धरे घर लइका आय।
माई-पिल्ला खुशी मनाय।।
मिलके गावँय मंगल गान।
राम, कृष्ण के जनम समान।।
-सोहर गीत

1087- सावन के अंजोरी आय।
टुकनी म गहूँ तब बोंवाय।।
नोनीमन हा सेवा गाय।
देवी गंगा गीत सुनाय।।
-भोजली गीत

1088- राजा घर ला छोड़े जाय।
कइसे वो योगी बन आय।।
सुख दुख पीरा मरम बताय।
इही बात सब गीत सुनाय।।
-भरथरी गीत

1089- गोदरिया धर तमुरा आय।
घर-घर जय गंगान सुनाय।।
दान दक्षिणा तुरते पाय।
गौंटनीन जय कहते जाय।।
-बसदेवा गीत

1090- नाच-गान एखर पहिचान।
हँसी ठिठोली बहुते जान।।
परी संग जोक्कड़ हा आय।
जिनगी खातिर सीख सिखाय।।
-नाचा

1091- शुरू कटै ता मन कहलाँव।
कटै आखिरी 'नम' हो जाँव।।
बीच कटै ता कुछु नइ पाँव।
ईश प्रार्थना, माथ नवाँव।।
-नमन

1092- कटै शुरू ता 'रस' हो जाय।
कटै आखिरी 'सार, कहाय।।
बीच कटै ता 'सास' पढ़ाय।
सादा रंगे चिरई आय।।
-सारस

1093- बीच कटै ता 'चाल' बताय।
कटै आखिरी 'चाव' कहाय।।
तीन वर्ण के हावय नाम।
आथे ये खाये के काम।।
-चावल

1094- शुरू कटै ता 'बड़ी' कहाय।
कटै आखिरी 'ईश' बलाय।।
हरै मिठाई के ये नाम।
आये ये खाये के काम।।
-रबड़ी

1095- बीच कटै ता 'खरा' जनाय।
कटै आखिरी चिट्ठी ताय।।
तीन वर्ण के नाँव सरेख।
सावचेत राहँय सब देख।।
-खतरा

1096- तीन वर्ण हे येला जान।
उल्टा-सीधा एक समान।।
शुरू कटै ता नाक कहाय।
कटै आखिरी कान सुनाय।।
-कनक

1097- शुरू कटै ता कान कहाय।
बीच कटै ता दूध पियाय।।
तीन वर्ण हे, का हे नाम।
बुता बाद तब आवै काम।।
-थकान

1098- कटै आखिरी 'नक' बन जाय।
बीच कटै नाली हो जाय।।
कटै शुरू ता फूल खिलाय।
तीन वर्ण हे, अमित बताय।।
-नकली

1099- उल्टा सीधा एक समान।
तीन वर्ण हे येला जान।
शुरू कटै ता लाज कहाय।
बीच कटै ता सजा सुनाय।।
-जलज

1100- शुरू कटै ता 'गर' बन जाय।
बीच कटै ता 'नर' कहलाय।।
कटै आखिरी 'नग' गिनवाय।
तीन वर्ण हे, कोन बताय।।
-नगर
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

चंद्रयान अभिमान

चंद्रयान  ले  नवा  बिहान,  हमर तिरंगा, बाढ़य शान। रोवर चलही दिन अउ रात, बने-बने बनही  हर  बात, दुनिया होगे अचरिज आज, भारत मुँड़़ अब सजगे ताज, ...