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सोमवार, 7 जून 2021

जानव जनऊला ~ (1051-1100)


1051- नोनी-बाबू खेलँय जान।
खंभा दू गाड़ै मैदान।।
आठ खिलाड़ी टीम बनाय।
भागय तेला छू दँउड़ाय।।
-खो-खो

1052- भुँइया मा ये खेले जाय।
दाँव सुघर दू दल देखाय।।
सात खिलाड़ी एक्के पार।
जौन छुवावै ओखर हार।।
-कबड्डी

1053- फुदुक-फुदुक ये खेले जाय।
उँखरू बइठे पाँव चलाय।।
नोनीमन ला बहुते भाय।
चिटिक जघा मा काम चलाय।।
-फुगड़ी

1054- दू दल येमा खेलय जान।
भर-भर साँसा गावँय गान।।
गावत खानी साँसा टूट।
होवय बाहिर, जावय छूट।।
-खुड़वा

1055- गेंद न बल्ला येमा जान।
बस चाही खुल्ला मैदान।।
लकड़ी नान्हें छोल बनाय।
डंड़ा मारय दाम पदाय।।
-गिल्ली डंडा

1056- एक पाँव मा उछले जाय।
डब्बा-डब्बा डाँड़ खिंचाय।।
खपरा, पखरा कुटका लान।
मुक्का-बोली खेलय जान।।
-बिल्लस

1057- डब्बा बनथें येमा चार।
खपरा कुटका खेल म सार।।
पाँच गड़ी मिल खेलँय खेल।
हार जीत के सुग्घर मेल।।
-फल्ली

1058- लकड़ी छोले गोल बनाय।
खाल्हे कोती खिला धराय।।
फरिया बर नेती बनवाँय।
फेंक पटक के खूब चलाँय।
-भौंरा

1059- होथे चीनी या ते काँच।
खेलँय लइका गड्डा खाँच।।
गिनथें सब दस बीस पचास।
जेखर जल्दी सौ वो पास।।
-बाँटी

1060- लइका बइठैं गोल बनाय।
दाम पदे वो बाहिर जाय।।
पटका धरके रहे लुकाय।
कखरो पाछू जाय मढ़ाय।।
-फोदा

1061- डारा पाना जम्मों लाल।
कोंवर भाजी करय कमाल।।
कमी लहू के पूरा होय।
विटामीन 'सी' बहुते सोय।।
-लाल भाजी

1062- चिक्कन-चिक्कन एखर पान।
येमा गुण के भरे खदान।।
राँधव भाजी आलू डार।
खावव सुग्घर दार बघार।।
-पालक भाजी

1063- चउमासा मा उपजै झार।
पान केंवची एखर सार।।
बिन पइसा के येला पाव।
बड़ गुणकारी, खच्चित खाव।।
-चरौंटा भाजी

1064- बहुते मँहगी होथे जान।
उँचहा भाजी उँचहा शान।।
होय पेड़ के पाना फूल।
फागुन मा ये आथे झूल।।
-बोहार भाजी

1065- रहिथे पानी जिहाँ भराय।
उँहचे छछले बहुते जाय।।
पाना डारा आवय काम।
गजब मिठाथे, जानँव नाम।।
-करमत्ता भाजी

1066- अमसुरहा अम्मट भरमार।
कोंवर पाना फर हे सार।।
भरे आयरन बड़ गुणकार।
फर के चटनी, सुकसा सार।।
-अमारी भाजी

1067- कटही पाना हे पहिचान।
हावय येमा गुण के खान।।
जाड़ा मा ये बहुते आय।
गुणकारी हे, दुनिया खाय।।
-कुसुम भाजी

1068- नइ तो कोनो हा उपजाय।
नँदिया तीर मा बहुते छाय।।
पेट रोग जब बहुत सताय।
खच्चित ये भाजी ला खाय।।
-गुमी भाजी

1069- चउमासा अउ जाड़ म आय।
कोंवर पाना साग बनाय।।
गिल्ला जुड़हा जघा म होय।
दुनिया स्वाद म एखर खोय।।
- तिनपनिया भाजी

1070- नान्हें झाड़ी येला जान।
खाथे कोंवर डारा पान।।
बनय मसलहा, अम्मट डार।
दार अमारी राँध सँघार।।
-चेंच भाजी

1071- भुँइया भीतर कांद कहाय।
ऊपर पाना बाँस सुहाय।।
चाय, साग मा डारे जाय।
चुरपुर पर गुणकारी आय।।
-आदा

1072- ऊपर पाना झाफर होय।
भुँइया भीतर काँदा सोय।।
दिखथे पींयर लकड़ी गाँठ।
भुरका करथें, पिसथें टाँठ।।
-हरदी

1073- गंजी मा पानी डबकाय।
शक्कर, आदा, दूध मिलाय।।
डारँय करिया भुरका पान।
फूँक-फूँक के पियै जहान।।
चाय

1074- घर अँगना मा चौंरा पाय।
नान्हें बिरवा बढ़ते जाय।।
फूल मंजरी पान सहाय।
गजब गुणी ये पौध कहाय।।
-तुलसी

1075- बारी बखरी उपजे जाय।
पाना पिस के चटनी खाय।।
महर-महर बड़ ये ममहाय।
येहा मुँहुँ के बास भगाय।।
-पदीना

1076- कथा महाभारत के गाय।
धरे तमूरा मंच म जाय।।
कौरव पांडव बात बताय।
लोकरंग मा रहे रँगाय।
-पंडवानी

1077- जैतखाम ला माथ नवाय।
गुरु घासी के कथा सुनाय।।
नाचँय माँदर, झाँझ बजात।
सत के सुग्घर बात बतात।।
-पंथी

1078- चइत कुँवारे मा नवरात।
देवी सेवा गीत सुनात।।
माँदर, ढ़ोलक, झाँझ बजाय।
दाई महिमा गाय सुनाय।।
-जस गीत

1079- करम करे के देवय सीख।
करौ मेहनत, झन लव भीख।।
इही भाव ले खुशी मनाँय।
गोल घेर सब नाचैं गाँय।।
-करमा

1080-  लोक गीत के रानी आय।
मया पिरित के गोठ सुनाय।।
काम बुता के संगे संग।
नाच-गान ये जिनगी रंग।।
-ददरिया

1081- अपन जँहुरिया मिल सकलाय।
माटी मिट्ठू बीच बिठाय।।
सज-धज सुग्घर गोल बनाय।
पिट-पिट ताली गीत सुनाय।।
-सुवा गीत

1082- देवारी के दिन जब आय।
राउत भाई सब सकलाय।।
सजे-धजे बड़ खुशी मनाय।
दोहा लउठी धरे सुनाय।।
-राउत नाचा

1083- चउमासा मा गजबे गाँय।
आल्हा-ऊदल कथा सुनाँय।।
नस-नस मा ये जोश जगाय।
लोककथा ये सब ला भाय।।
-आल्हा

1084- गौरा-गौरी मुरत बनाय।
बर बिहाव के नेंग मढ़ाय।।
फूल कुचरना पहिली आय।
सुग्घर उत्सव, गीत सुनाय।।
-गौरा गीत

1085- चुलमाटी, मड़वा जब छाय।
देवतला अउ तेल चघाग।।
नेंग भड़ौनी भाँवर होय।
बेर बिदाई, जम्मों रोय।।
-बिहाव गीत

1086- जनम धरे घर लइका आय।
माई-पिल्ला खुशी मनाय।।
मिलके गावँय मंगल गान।
राम, कृष्ण के जनम समान।।
-सोहर गीत

1087- सावन के अंजोरी आय।
टुकनी म गहूँ तब बोंवाय।।
नोनीमन हा सेवा गाय।
देवी गंगा गीत सुनाय।।
-भोजली गीत

1088- राजा घर ला छोड़े जाय।
कइसे वो योगी बन आय।।
सुख दुख पीरा मरम बताय।
इही बात सब गीत सुनाय।।
-भरथरी गीत

1089- गोदरिया धर तमुरा आय।
घर-घर जय गंगान सुनाय।।
दान दक्षिणा तुरते पाय।
गौंटनीन जय कहते जाय।।
-बसदेवा गीत

1090- नाच-गान एखर पहिचान।
हँसी ठिठोली बहुते जान।।
परी संग जोक्कड़ हा आय।
जिनगी खातिर सीख सिखाय।।
-नाचा

1091- शुरू कटै ता मन कहलाँव।
कटै आखिरी 'नम' हो जाँव।।
बीच कटै ता कुछु नइ पाँव।
ईश प्रार्थना, माथ नवाँव।।
-नमन

1092- कटै शुरू ता 'रस' हो जाय।
कटै आखिरी 'सार, कहाय।।
बीच कटै ता 'सास' पढ़ाय।
सादा रंगे चिरई आय।।
-सारस

1093- बीच कटै ता 'चाल' बताय।
कटै आखिरी 'चाव' कहाय।।
तीन वर्ण के हावय नाम।
आथे ये खाये के काम।।
-चावल

1094- शुरू कटै ता 'बड़ी' कहाय।
कटै आखिरी 'ईश' बलाय।।
हरै मिठाई के ये नाम।
आये ये खाये के काम।।
-रबड़ी

1095- बीच कटै ता 'खरा' जनाय।
कटै आखिरी चिट्ठी ताय।।
तीन वर्ण के नाँव सरेख।
सावचेत राहँय सब देख।।
-खतरा

1096- तीन वर्ण हे येला जान।
उल्टा-सीधा एक समान।।
शुरू कटै ता नाक कहाय।
कटै आखिरी कान सुनाय।।
-कनक

1097- शुरू कटै ता कान कहाय।
बीच कटै ता दूध पियाय।।
तीन वर्ण हे, का हे नाम।
बुता बाद तब आवै काम।।
-थकान

1098- कटै आखिरी 'नक' बन जाय।
बीच कटै नाली हो जाय।।
कटै शुरू ता फूल खिलाय।
तीन वर्ण हे, अमित बताय।।
-नकली

1099- उल्टा सीधा एक समान।
तीन वर्ण हे येला जान।
शुरू कटै ता लाज कहाय।
बीच कटै ता सजा सुनाय।।
-जलज

1100- शुरू कटै ता 'गर' बन जाय।
बीच कटै ता 'नर' कहलाय।।
कटै आखिरी 'नग' गिनवाय।
तीन वर्ण हे, कोन बताय।।
-नगर
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

शुक्रवार, 4 जून 2021

जानव जनऊला ~ (1001-1050)

1001- लाली डब्बा हावै साँच। भीतर बहुते पींयर खाँच।।
खाँचा मा बड़ मोती दाँत। खावँय जम्मों मजा उड़ाँत।।
-अनार

1002- आजे भर उपयोगी जान। काली बर ये रद्दी मान।।
घर बइठे सब जानँय हाल। कागज कुटका करै कमाल।।
-अखबार

1003- करिया घोड़ा बइठे ताय। बइठे-बइठे ये ललियाय।।
खूब सवारी सादा आय। उतरै एक दुसर चढ़ जाय।।
-तावा अउ रोटी

1004- गोल हवै पर नो हे गेंद। कहाँ माढ़थे, नइ हे पेंद।।
पूछी हावै, नो हे गाय। लइकामन हा बहुते भाय।।
-फुग्गा

1005- शुरू कटै ता 'दर' बन जाय। कटै आखिरी 'बंद' कहाय।।
तीन वर्ण के एखर नाँव। जंगल झाड़ी एखर ठाँव।
-बंदर

1006- कटै शुरू ता 'गर' बन जाय। बीच कटै ता मनुज कहाय।।
कटै आखिरी 'नग' पढ़ पाय। तीन वर्ण हे, बोलव काय।।
-नगर

1007- आँखी ऊपर रहिथे तान। पातर करिया परे निसान।
कुकर बोल एखर हे नाँव। सोंचव संगी एके घाँव।।
-भौं

1008- एक मुँड़ी अउ तीनों हाथ। रहिथन जम्मो एक्के साथ।।
गोल-गोल मैं घूमँव रोज। गरमी मा सब करथें खोज।।
-पंखा

1009- एक पाँव अउ धोती आठ। आनी-बानी एखर ठाठ।।
सावन-भादो बहुते रोय। बाँकी बेरा खुँटी म होय।।
-छाता

1010- जाथे मनखे हाट बजार। लाथें मोला पइसा डार।।
खाये खातिर मोल बिसाँय। पर मोला कोनो नइ खाँय।।
प्लेट, चम्मस

1011- रतिहाकुन इन रोजे आँय। नइ तो काँही कुछु चोराँय।।
दिनभर येमन रहै लुकाँय। अँधियारी मा मुँहुँ देखाँय।।
-चंदैनी

1012- दू आखर के सुग्घर नाम। आथे येहा सबके काम।।
उल्टा लिख दे होय जवान। बिन एखर तो हाय परान।।
-वायु

1013- पानी बिन ये भवन बनाय। देवय सबके संग मिलाय।।
बइठे-बइठे जोहत जाय। फाँस-फाँस के भोजन पाय।।
-मेकरा अउ जाला

1014- हावय एखर बहुते दाँत। बिन मुँहुँ के ये करथे बात।।
गुरतुर-गुरतुर एखर बोल। सुन-सुन जाथे मन हा डोल।।
-हारमोनियम

1015- हवै सींग, छेरी झन जान। काठी हे, घोड़ा झन मान।।
ब्रेक हवै पर नो हे कार। घंटी हे पर नो हे द्वार।।
-साइकिल

1016- तीन वर्ण के हावय नाम। आवय ये खाये के काम।।
बीच कटे ता 'हवा' कहाय। कटै अंत 'नाँगर' बन जाय।।
-हलवा

1017- दिनभर सूरुज देख बिताय। सूरुज कोती मुँड़ी घुमाय।
काय बाता मा जाय रिसाय। रतिहाकुन ये मुँड़ी नवाय।।
-सुरजमुखी

1018- फूल एकठन अइसन जान। अजब कहानी एखर मान।।
पाना ऊपर पाना छाय। दुनिया भर मा बहुते भाय।।
-पत्ता गोभी

1019- दू आँगुर के सड़क कहाय। आदत अपने कड़क बताय।।
सबके घर मा आवय काम। आग लगइया एखर नाम।।
-माचिस

1020- रुखराई मा रात बिताय। चींव-चींव कहि गीत सुनाय।।
संझा बिहना उड़ते जाय। रिंगी चिंगी पाँख रचाय।।
-चिरई

1021- अचरिज करथे एखर खेल। जलथे बिन बाती बिन तेल।।
पाँव बिना ये रेंगत जाय। अँधियारी ला मार भगाय।।
सूरुज

1022- कटै शुरू ता नून कहाय। बीच कटै ता बोल सुनाय।।
कटै आखरी कनवा जान। तीन वर्ण हे झट पहिचान।।
-कानून

1023- शुरू कटै ता ये बंदूक। कटै आखिरी आगी लूक।।
बीच कटै ता देखव शान। तीन वर्ण के मोला जान।।
-आँगन

1024- ना तो येहा आगी आय। ना तो ये कोनो ल जलाय।।
परथे येला तभो बुझाय। संगी देवय तुरत बताय।।
-प्यास

1025- एक फसल हे बिन बोंवाय। खातू माटी नइ तो पाय।।
हब-हब येहा बाढ़े जाय। काटे बर बनिहार लगाय।।
-चुन्दी

1026- तीन पाँव पर रेंग न पाँव। एक जघा जिनगी ल बिताँव।।
भाग सकँव ना मैं हा यार। बाँध रखय मोला संसार।।
-घड़ी

1027- मोर एक ना हाथे पाँव। तभो पहुँच जावँव हर ठाँव।।
बिन मुँहुँ के मैं बात बताँव। धीर लगा के आवँव जाँव।।
-चिट्ठी

1028- नाँव सुनत मा सब थर्राय। पर के इच्छा नाँव धराय।।
करँय तियारी सब संसार। पाये बर एखर ले पार।।
-परीक्षा

1029- आगी हा नइ सके जलाय। पानी हा नइ सके भिगाय।।
संगे आवय संगे जाय।। चतुरा संगी नाँव बताय।।
-अपन छँइहा

1030- फूल नहीं पर ये ममहाय। जरथे पर इरखा न कहाय।।
पूजा घर मा एखर ठाँव। सोंच बताऔ एखर नाँव।।
-अगरबत्ती

1031- एती ओती गजब घुमाय। नींद परे मा ही ये आय।।
आँख मूँद के देखन भाय।हछूये मा ये नइ छूवाय।।
-सपना

1032- ना ये एक्को तनखा पाय। कहाँ कभू ये जेवन खाय।।
घर के बाहिर लटक बिताय। डँट के पहरा तभो निभाय।।
-ताला

1033- मिलथे जेला मन खिल जाय। जादा होगे ता रोवाय।।
लगन मेहनत जौन कमाय। ओखर तीरे बहुते आय।।
-खुशी

1034- डबिया हावय अइसन एक। बिन ढ़कना तारा हे नेक।।
पेंदी कोन्हा नइ तो जान। भीतर सोना चाँदी मान।।
-अण्डा

1035- अंत कटै मनखे बन जाय। कटै बीच ता जम कहलाय।।
शुरू कटै ता नरम पढ़ाय। तीन वर्ण हे, कौन बताय।
-जनम

1036- बिन आगी के खीर बनाय। नुनछुर-गुरतुर स्वाद जनाय।।
चिटिक चाँटबे खूब मिठाय। जादा खाबे जीभ कटाय।।
-खाये के चूना

1037- रोवत ला ये हँसवाय। आनी-बानी नाच दिखाय।।
नाचा गम्मत मा ये छाय। सर्कस भीतर देखे जाय।।
-जोकर

1038- लगै प्यास ता पीते जाव। भूख लगै ता खाते खाव।।
लगै जाड़ ता इही जलाव। काय हरै झट नाँव बताव।।
-नरियर

1039- एक चीज अचरिज हे मान पानी ले बनथे ये जान।।
सूरुज नइ तो सकै सुखाय। तन मा उपजे, कौन बताय।।
-पछीना

1040- सुतत साठ ये हा सुत जाय। उठत बेर ये झट उठ आय।।
येहा बहुते हरू जनाय। आँखी के परदा कहलाय।।
-आँखी के पलक

1041- धरती ले ये उपजे आय। बादर कोती मुँड़ी उठाय।।
हालै-डोलै, रेंग न पाय।। अपन पाँव ले जेवन खाय।।
-रुखराई

1042- चार कुआँ बिन पानी जान। चोर अठारा घूमय मान।।
चोर बीच मा रानी एक। पुलिस कुआँ मा मारय फेंक।।
कैरमबोर्ड

1043- मुकुट मुँड़ी मा खापे लाल। घेंच ओरमे झोला झाल।।
पाँखी डेना शोभा आय। चिरई होके नइ उड़ियाय।।
-कुकरा

1044- राजमहल हरियर हे एक। हावय भिथिया पींयर नेक।।
भीतर बइठे करिया चोर। राजमहल ला दय बिल्होर।।
-अरंमपपई

1045- चक्का दूठन एखर सार। महिमा हावय अपरंपार।।
बइठ सीट अउ पैडिल मार। चढ़व फिरौ सुग्घर संसार।।
-साइकिल

1046- घर अँगना मा आवय मोर। चींव-चींव के करके शोर।।
दाना पानी खाय उड़ाय। बड़े बिहनिया गीत सुनाय।।
- गौरइया चिरई

1047- कँसे डोकरी कनिहा एक। बुता करय ये रोजे नेक।।
घर अँगना सुग्घर चमकाय। साफ सफाई बहुते भाय।।
-बहरी

1048- हाथ लगै ता चलते जाय। जौन पाय सब काट मढ़ाय।।
थक जावय ता ये सुरताय।। पखरा चाटै जोश बढ़ाय।।
-चाकू

1049- रोज बिहनिया हाथ म आय।। गजब चाबथें फेर न खाय।।
करै सफाई जिभिया दाँत। फेंकय करके सब दूँ फाँत।।
-दतुवन

1050- तीन वर्ण हँव मोला जान। उल्टा सीधा एक समान।।
शुरू कटै ता 'टक' बन जाय। कटै आखिरी 'कट' कहलाय।।
-कटक
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कन्हैया साहू 'अमित'~भाटापारा छत्तीसगढ़

सोमवार, 31 मई 2021

जानव जनऊला ~ (951-1000)


951- सादा उज्जर एखर रंग।
रहै शांत, नइ जानय उतलंग।।
सिधवा जइसे एखर हाल।
बहुते कपटी चतुरा चाल।।
-कोकड़ा

952- रहिथे येहा ताते तात।
राँधय येहा जेवन घात।।
हवा देख ये बड़ थर्राय।
पानी पीके मर ये जाय।।
-आगी

953- एक पेड़ मा गजब डँगाल।
मन मा आथे एक सवाल।।
भारी कटही फर ला जान।
भरे रथे फर मा गुन खान।।
-कटहर

954- नान्हें नोनी नटखट जान।
एखर हावय छोट मकान।।
दें केंवची कोंवर घात।
पटर-पटर ये करथे बात।।
-जीभ

955- एक पेड़ हे हाथी पाँव।
बारी बखरी एखर ठाँव।।
पाना एखर हाथी कान।
लकड़ी नो हे, ले पहिचान।।
-केरा पेड़

956- एक जिनिस ये कइसे होय।
बीच सभा मा बइठे रोय।।
थूँक-थूँक के जम्मों जाय।
परे डरे ये कहाँ कहाय।।
-थूँकदानी

957- दाँत बिना ये लेवय काट।
बिना पाँव के रेंगय बाट।।
चर्र-चर्र हे एखर बोल।
सबो बिसावैं देके मोल।।
-पनही

958- दूध दही के सकला होय।
लान मथानी गजब बिलोय।।
सादा उज्जर ये उफलाय।
कड़क चुरो के घीव बनाय।।
-लेवना

959- देंह एक हे सुग्घर सार।
जेखर ऊपर सात दुवार।।
पंछी एखर भीतर होय।
आवाजाही दिखे न कोय।।
-प्राण

960- तन हा हावै एखर एक।
दिखै नहीं पर होथे नेक।।
राहय एखर हाथ न पाँव।
दँउड़े जाथे दुनिया ठाँव।।
-मन

961- इक नोनी के अलकर नाँव।
दू तरपौंरी छैठन पाँव।।
ओखर मुँड़ मा मेछा यार।
जाथे उघरा हाट बजार।।
-तराजू

962- दरजा उँचहा खाल्हे काम।
रोज बिहनिया एखर नाम।।
जौन जघा मा ये नइ जाय।
कोनो ला बइठन नइ भाय।।
-बाहरी

963- दू कौड़ी हे करिया जान।
एखर आगू दुनिया मान।।
एक कटोरी पानी ताय।
बीच-बीच मा टपके जाय।।
-आँखी

964- रिंगी-चिंगी चमकै काँच।
लागय सुग्घर सबले साँच।।
नारीमन के मन ला भाय।
गोल-गोल ये बाँह म छाय।।
-चूरी

965- मुँड़ खुसरे हे भीतर पार।
चोट-बड़े चक्का हे सार।।
निकले पसली बाहिर देख।
सूँत बरावय चिटिक सरेख।।
-चरखा

966- जीभ फटे अउ मुँड़ी कटाय।
अपने मन के बात बताय।।
आखर करिया उगले जाय।
खीसा भीतर ठौर बनाय।।
-कलम

967- पेट बड़े अउ मुँहुँ हे जान।
पेंदी चाकर, काँच समान।।
पढ़े-लिखे मा आथे काम।
संग कलम के जुड़थे नाम।।
-दवात

968- घेरावाला लँहगा डार।
एक पाँव मा फिरै अपार।।
हाथ आठ देवय फैलाय।
जाड़ पड़े मा ये सकलाय।।
-छतरी

969- कटै आखिरी पाँव कहाय।
शुरू कटै संगी बन जाय।।
तीन वर्ण के हावय नाम।
आथे मुँड़ मा पहिरे काम।।
-पगड़ी

970- कटै आखिरी सीता जान।
शुरू कटै संगी तैं मान।।
जंगल मा ये रहिथे यार।
तीन वर्ण के लिखना सार।।
-सियार

971- चाम माँस येमा नइ होय।
हाड़ा चारों कोती सोय।।
तभो हवै ये बहुते खास।
एखर भीतर जीव निवास।।
-पिंजरा

972- मुँड़ मा चुन्दी जटा समान।
सादा उज्जर रंगत जान।।
हाथ म पोथी धारे जाय।
जोगी ज्ञानी कहाँ कहाय।।
-लहसुन

973- एक सींग अउ चारे कान।
एक पाँव हे एखर मान।।
तामस गुण अउ करिया रंग।
रँधनी खोली राहय संग।।
-हींग

974- चोला उज्जर सादा सोय।
जटा मुँड़ी मा एखर होय।।
एक गोड़ मा धरथे ध्यान।
भारी कपटी येला जान।।
-कोकड़ा

975- सरी जगत ला देखत जाय।
कभू अपन नइ गाँव ल पाय।।
हाँसय-रोवय अपने आप।
नँदिया भीतर रहिथे खाप।।
-आँखी के पुतरी

976- कारी गोरी दूझन नार।
नाँव एक हे इँखरो यार।।
छोट-बड़े होथें इन खास।
एक करू अउ एक मिठास।।
-लायची

977- हरियर लुगरा पहिरे नार।
जन-जन के करथे सत्कार।।
जेवन पाछू काम म आय।
सबके मुँहुँ ला लाल रचाय।।
-पान

978- एक चिरैया घुमते जाय।
भर-भर पानी तँउरे भाय।।
भरे कुआँ मा ये सुरताय।
रहि-रहि पानी फेर मँगाय।।
-मथानी

979- एती ओती मैं हा जाँव।
सबला ओखर घर पहुँचाँव।।
फेर अपन मैं जघा न पाँव।
एक जघा मा बइठ पहाँव।।
-रद्दा

980- करिया हे कौआँ झन मान।
खम्भा हे हौआ झन जान।।
लाम नाक ले करथे काम।
लटपट रेंगय बोलव नाम।।
-हाथी

981- एक अचंभा देखे जाय।
मुरदा होके रोटी खाय।।
कोनो कोन्हा रहै लुकाय।
मार परै ता चिहुर मचाय।।
-माँदर

982- जइसे नँदिया पूरा पाट।
चंदन चोवा बगरे घाट।।
एक हाथ खूँटा गड़ियाय।
चारों मूँड़ा घूमत जाय।।
-जाँता

983- हरियर लुगरा ओढ़े आय।
लाखों मोती धरे सुहाय।।
पहुँचै राजा के दरबार।
एखर लत्ता तुरत उतार।।
-भुट्टा

984- एती-वोती ले ये आय।
चिटिक जघा मा बइठ समाय।।
हाथ धरे ये आये जाय।
नाँव काय हे कोन बताय।।
-लाठी

985- कुबरी तन हे, मया जताय।
आँखी आगू बइठे जाय।।
पाँव अपन ये नाक मढ़ाय।
कान हाथ ले अँइठे पाय।।
-चश्मा

986- शुरू कटै ता 'गरा' कहाय।
कटै आखिरी 'आग' लगाय।।
बीच कटै 'आरा' बन जाय।
तीन वर्ण के नाँव बताय।।
-आगरा

987- बीच कटै ता 'बरी' कहाय।
मुँड़ी कटै ता 'करी' बनाय।।
कटै आखिरी 'बक' बन जाय।
तीन वर्ण के जीव सुहाय।।
-बकरी

988- शुरू कटै ता 'नर' कहलाय।
कटै आखिरी धनुष चढ़ाय।।
बीच कटै ता दिन बन जाय।
जीव बहुत ये उधम मचाय।।
-वानर

989- बीच कटै चंचल भटकाय।
शुरू कटै सब बात सुनाय।।
कटै आखिरी 'मका' कहाय।
तीन वर्ण हे सब ला भाय।।
-मकान

990- चार वर्ण के एखर नाम।
विष्णु कृष्ण के करथे काम।।
शुरू कटै ता दर्शन होय।
भगवन अँगरी येहा सोय।।
-सुदर्शन चक्र

991- कटै शुरु ता कम पर जाय।
बीच कटै दर्जन कहलाय।।
कटै आखिरी चिरई होय।
तीन वर्ण हे जानव कोय।।
-बाजरा

992- पाँख हवै पर कहाँ उड़ाय।
पाँव हवै पर रेंग न पाय।।
हाथ धरे चक्का ल चलाय।
लामी लामा सूँत लमाय।।
-चरखा

993- शुरू कटै तरिया बन जाय।
बीच कटै ता 'केर' कहाय।।
कटै आखिरी मुँड़ी सजाय।
तीन वर्ण हे, कोन बताय।।
-केसर

994- रतिहाकुन ऊपर ले आय।
डारा पाना मा इँतराय।।
मोती जइसे एखर रूप।
एकोकन सहि सकै न धूप।।
ओस

995- हाथ बोलथे सुनथे हाथ।
बोल न होवय एखर साथ।।
छुअत बतावै जम्मों हाल।
हे जनऊला बड़े कमाल।।
-नाड़ी

996- पानी थोरिक रहै भराय।
ऊपर मुँहड़ा आग धराय।।
गुड़गुड़ बोली गजब सुनाय।
बीच-बीच मा धुआँ उड़ाय।।
-हुक्का

997- पाँव तीन हे, चलै न एक।
बइठे राहय जघा म टेक।।
जो जन एखर तीर म जाय।
एखर ऊपर बइठे पाय।।
-तिपाया

998- घटै बढ़ै चंदा झन जान।
करिया हे कोयल झन मान।।
बहुते येहा आवय काम।
बोलव संगी का हे नाम।।

999- घोड़ा माटी के तैं जान।
ऊपर लोहा गोल मकान।।
बइठै येमा गिल्ला राम।
निकलै हो के सुख्खा श्याम।।
-तावा

1000- आवय ता करै अचेत।
बइठै मा अँधरा कर देत।।
उठै तभो पीरा दे जाय।
जावत खानी खूब सताय।।
-आँखी रोग
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

रविवार, 30 मई 2021

जानव जनऊला ~ (901-950)

901- तीन वर्ण ये सब ला भाय।
बीच कटै ता फर बन जाय।।
शुरू कटै प्रभु नाम कहाय।
कटै अंत ता चीर मढ़ाय।।
-आराम

902- फर अइसने के आँख मुँदाय।
फोरे मा अंड़ा मन भाय।।
ये अंडा ला जौने खाय।
तन-मन अपने पोठ बनाय।।
-बादाम

903- एक जघा ना ये टिक पाय।
रूप मनोहर जग भर छाय।।
मानुसमन येमा हे खोय।
दीन-हीन एखर बिन होय।।
-रुपिया, पइसा

904- इक नारी के छै औलाद।
दू-दू झन ला करथे याद।।
छै झन ला ये संग बलाय।
सँघरा येमन कभू न आय।।
-मौसम

905- दू आखर के हावय नाम।
हाड़ा भीतर एखर धाम।।
नाड़ी ले ये आवव जाय।
कोनो बिरथा नहीं गँवाय।
-लहू

906- तीन वर्ण के हावय नाम।
आवय येहा सबके काम।।
रहै देंह ले ये लपटाय।
इज्जत हमरे इही बचाय।।
-कपड़ा

907- हाड़ माँस तन नइ हे जान।
हाथ-पाँव बिन लमरी मान।।
राहय ये हा जेखर हाथ।
सुख-दुख मा ये देवय साथ।।
-लाठी

908- अपने मुख ला देखे जाय।
देख-देख मन मा मुस्काय।।
एखर आगू सकल समाज।
शोभा बाढ़य करके साज।।
-आईना
909- सोन सहीं चमकै ये खास
रहिथे येहा ऊँच अगास।।
करै कभू नइ ये कल्याण।
धमकावत ये हर लै प्राण।।
-गाज

910- बाग बगीचा महल अटार।
मंदिर मस्जिद अउ गुरुद्वार।।
छानी परवा, रुख लपटाय।
चढ़के नँगते ये मुस्काय।।
-नार/बियाँर

911- मेछा दाढ़ी पहिली आय।
पाछू लइका जनमे पाय।।
बाढ़य लइका, कहाँ दुलार।
काहँय लत्ता सबो उतार।।
भुट्टा

912- पर्वत ऊपर रथ ल चलाय।
भुँइया मा राखय टेकाय।।
वायु वेग एखर रफ्तार।
एक पाँव ना उसलै यार।।
-कुम्हार के चाक

913- पानी मा ही समय बिताय।
कोव-कोव ये बड़ चिल्लाय।।
मछरी मेढ़क नो हे साँप।
थोरिक उड़थे, लेवव भाँप।।
-पनबुड़ी

914- जंगल म कटै, होय तियार।
उपजै बाढ़य जाय बिसार।।
जिनगी पानी बीच बिताय।
बुड़ै मरै ना ये बोहाय।।
-डोंगा

915- अचरज नारी हावय एक।
बहुते ओखर बुद्धि विवेक।।
पढ़े-लिखे ना एक्को आय।
जियत-मरत ला तुरत बताय।।
-नाड़ी

916- एक गाँव हे बहुते खास।
एक महल मा एक निवास।।
पहिरै पींयर सबझन जान।
नर नारी नइ हे पहचान।।
-ततैया छाता

917- लोहा के नान्हें औजार।
एक आँख एखर हे सार।।
जेखर तीर म येहा जाय।
बिछड़ेमन के मिलन कराय।।
-सुजी

918- एक आदमी देंह म गाँठ।
लामी-लामा तन हा टाँठ।।
भारी गुरतुर एखर स्वाद।
चीनी गुड़ एखर औलाद।।
-कुसियार

919- दू आखर के हावय नाम।
शुरू कटै ता मइला काम।।
कटै बीच दूसर दिन जान।
कटै आखिरी थोरिक मान।।
-कमल

920- एक आदमी चाम न माँस।
धीर रास के चलथे साँस।।
हाड़-हाड़ एखर छेदाय।
बोली सुन के जग मोहाय।।
-बँसरी

921- पिड़वा बइठे रानी एक
मुँड़ मा आगी धरे कतेक।।
तन मा पानी रहै बोहाय।
बार-बार मुँड़ काटे जाय।।
-मोमबत्ती

922- एक गोड़ अउ कान ह चार।
अद्भुत अइसन हावय नार।।
तामस बहुते हवै मिजाज।
कारी हे पर आवय काज।।
-हींग

923- खात-खात मुँहुँ हा जर जाय।
हरियर लाली फर ये आय।।
दिखे म नान्हें मन ला भाय।
बड़े-बड़े ला झट रोवाय।
-मिरचा

924- साहब खाना येमा खाय।
कुआँ गिरे बाल्टी निकलाय।।
रुखराई मा होथे जान।
कभू-कभू दुख देथे मान।।
-काँटा

925- रहै शान्त, बहुते चुपचाप।
पानी राहय जुड़ टिपटाप।।
पियै बटोही, मिटै पियास।
लोटा धरे न एक गिलास।।
-कुआँ

926- दुब्बर पातर झन तैं जान।
गजब हरै ये गुण के खान।।
करिया मुँहुँ ला उज्जर मान।
संगत एखर करय सुजान।।
-कलम

927- करिया-करिया एखर रंग।
रहिथे डारा-पाना संग।।
खाबे तब ये जीभ रचाय।
गजब मिठाथे नून मिलाय।।
-जामुन

928- अलकर घोड़ी बारा पाँव।
रेंगत राहय पाय न ठाँव।।
एखर ऊपर तीन सवार।
कोनो कभू न जाय बिसार।।
-घड़ी

929- सदा बढ़ावै शोभा जान।
करिया रंग ल तैं पहिचान।।
पारै आँखी तीर निसान।।
लइका बर शुभ टीका मान।।
-काजर

930- रतिहाकुन सज-धज के आय।
दिनभर अपने घर सुरताय।।
चमचम चमकै मन ला भाय।
उजियारी जुड़हा बगराय।।
-चंदैनी

931-बिना पाँख के ऊँच उड़ाय।
घेंच म पातर डोर बँधाय।।
हवा मितानी एखर जान।
पानी देखत त्यागे प्रान।।
-पतंग

932- बिना बरे कुछु काम न आय।
बारे मा ये गजब सुहाय।।
परे रहै दिन मा तिरियाय।
रतिहाकुन झट सुरता आय।।
-चिमनी

933- अचरिज धन अइसन ये आय।
जतके बाँटव बढ़ते जाय।।
नहीं चोर येला चोराय।
सदा हमर ये मान बढ़ाय।।
-विद्या

934- एक पेड़ के बड़का ठाँव।
खाल्हे राहय छाँवे छाँव।।
मेछा दाढ़ी लामी लाम।
संगी बोलव एखर नाम।।
-बर पेड़

935- दुख पीरा मा झरते जाय।
खुशी परे मा थोरिक आय।।
नुनछुर लागय एखर स्वाद।
आँखी ला तैं कर ले याद।।
-आँसू

936- कोनो सकै न येला मार।
काटय ना कोनो हथियार।।
संग सबो के रहिथे यार।
राजा मंत्री अउ दरबार।।
-छँइहा

937- करिया कुत्ता झबरू कान।
मुकुट खाप के चलै सियान।।
सबो संग जोरय ये खाँध।
जोड़ी सबके संगे बाँध।।
-भाँटा

938- खूँटा डाँगा बहुते ताय।
गुरतुर एखर दूध मिठाय।।
दिखथे मुखड़ा जइसे गाय।
जिनगी पानी बीच पहाय।।
-सिंघाड़ा

939- गोल गोलवा मोला मान।
तहूँ हवच जी लमरी जान।।
ऊपर तोर कान तोपाय।
हमर देंह ला उघरा पाय।।
आलू-भाँटा

940- तरिया डबरी उपजे जाँव।
आरुग फर मैं महूँ कहाँव।।
साधू संतन मानय खास।
खावँय मोला रहैं उपास।।
-सिंघाड़ा

941- आथे-जाथे, नइ हे पाँव।
नगर-शहर बस्ती अउ गाँव।।
शोर संदेशा घर पहुँचाय।
पानी मा ये मर-हर जाय।।
-चिट्ठी पत्री

942- पानी भीतर चमके जाय।
बिन पानी के मरना आय।।
पानी भीतर करै निवास।
कतको धो ले हटै न बास।।
-मछरी

943- बड़का उँचहा येला जान।
खड़े रथे ये अपने स्थान।।
घर कुरिया के ये रखवार।
ईंटा पखरा ले दमदार।।
-भिथिया

944- भरे खजाना मोती माल।
देख-देख बस हो खुशहाल।।
हेर सकै ना कोनो जान।
एखर चक्कर छुटथे प्रान।।
दतैया छाता

945-  बइला जेखर एक न सींग।
लाम लाहकर टींगे टींग।।
नाँगर मा नइ जोंते जाय।
आगू आ के प्रान गँवाय।।
-बघवा

946- करिया लउठी लामी लाम।
आय नहीं टेंके के काम।।
नइ तो येहा हाथ धराय।
देखत येला सबो डराय।।
-साँप

947- फुलवारी के घमघम फूल।
उल्टा लटके राहय झूल।।
कोनो येला टोर न पाय।
कहाँ हाथ ले ये अमराय।।
-चँदैनी

948- सोन चिरइया येला जान।
करिया मुख एखर पहिचान।।
पेट भीतरी दाना चार।
जंगल झाड़ी हे घर द्वार।।
-तेंदू

949- खनखन बाजत चलते जाय।
तरिया नँदिया बूड़ नहाय।।
जीवमार बड़ इही कहाय।
फेर एकठन कुछु नइ खाय।।
-मछरी जाली

950- नान्हें चिरई येला जान।
उँचहा उड़ना हे पहिचान।।
रहिथे लइकामन के साथ।
उड़ना गिरना इँखरे हाथ।।
-पतंग
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

चंद्रयान अभिमान

चंद्रयान  ले  नवा  बिहान,  हमर तिरंगा, बाढ़य शान। रोवर चलही दिन अउ रात, बने-बने बनही  हर  बात, दुनिया होगे अचरिज आज, भारत मुँड़़ अब सजगे ताज, ...