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मंगलवार, 1 जून 2021

दुलरवा दोहा ~ चम्पारण

चंपारण्य

राजिम संगम तीर मा, हे चम्पारण धाम।
प्रभु वल्लभ आचार्य के, जुड़े हवै शुभ नाम।।

जनम धरिन एकादशी, महिना तब बैशाख।
कृष्ण भक्त के अवतरण, अँधियारी के पाख।।

पुष्टि मार्ग के चलइया, भक्त वल्लभाचार्य।
शिक्षा दीक्षा संग मा, सेवा अउ सत्कार्य।।

दर्शन के सिद्धांत कहि, अपन चलाइन पंत।
तीन तत्व ही सार हे, कहिन सुजानी संत।।

एकमात्र हे ब्रम्ह हा, सदा सत्य अउ सार।
जीव, जगत, ईश्वर अमित, हरै जगत आधार।।

शुद्ध तत्व तीनों हरँय, इही धरम मरजाद।
प्रभु जी के जम्मों कथन, शुद्ध द्वैत के वाद।।

पढ़हंता बहुते गजब, कृष्ण भक्ति के दास।
लिख डारिन बड़ ग्रंथ ला, बनिन गुरू ये खास।।

चौरासी झन चेला इँखर, मन में भरैं हुलास।
सूरदास कुंभन सहित, कृष्ण दास हें खास।।

उत्तरमीमांसा लिखिन, कतको लिखिन निबंध।
भक्ति सगुण निर्गुण जघा, बगरिस पुष्टि सुगंध।।

चम्पारण मा हे बने, मंदिर बहुत विशाल।
देखत अचरिज हो चले, अंतस भर खुशहाल।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

दुलरवा दोहा ~ तुरतुरिया

तुरतुरिया

जनमें लवकुश हा इहाँ, देव वाल्मिकी धाम।
जघा इही पावन अमित, तुरतुरिया अब नाम।।

बहथे गंगा सुरसरी, तुरतुर-तुरतुर बोल।
जंगल झाड़ी बीच मा, हावँय पखरा खोल।।

गाँव बहरिया तीर मा, बलभद्री बोहाय।
त्रेतायुग वाल्मीकि जी, आश्रम इहें बनाय।।

हे पहाड़ उँचहा गजब, जंगल बड़ घनघोर।
जलप्रवाह पथरा परै, होवय तुरतुर शोर।।

जल गुजरै जलकुंड ले, गोमुख जइसे जान।
दूनों बाजू मा लगे, मुरत विष्णु भगवान।।

बहुत मिले शिवलिंग हे, पखरा के अवशेष।
जान जाँय इतिहास ला, दुनिया देश विदेश।।

बौद्ध शैव वैष्णव धरम, मुरती के उद्गार।
बौद्ध भिक्षु राहँय इहाँ, अपने बौद्ध विहार।।

शिलालेख मा हे लिखे, होंय पुजारिन नार।
आज चलागत मा हवै, जुन्ना इही विचार।।

हे पहाड़ के ऊँच मा, बघवा माड़ा खोल।
एक संग सौ भक्तमन, भीतर जावँय डोल।।

पूष महीना मा भरै, मेला अपरंपार।
आवँय दर्शन बर अमित, भक्तन कई हजार।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055..©®

दुलरवा दोहा ~ शिवरीनारायण

शिवरीनारायण

महानदी के संग मा, मिलै जोंक शिवनाथ।
नर नारायण देवता, सदा नवावौं माथ।।

सँवरा-सँवरी भक्त के, राखिन प्रभु हा लाज।
शिवरीनारायण कहैं, जेला जन-जन आज।।

नारायण मंदिर बने, शिल्पकला मन भाय।
भव्य द्वारशाखा बने, मुरती फभित बढ़ाय।।

कुंड रोहिणी हा बने, ये मंदिर के बीच।
पानी टिपटिप ले भरे, होय न एको कीच।।

चरण कमल प्रभु राम के, इही कुंड धोराय।
एखर सेती कुंड जल, अक्षय जल कहलाय।।

मंदिर बड़ सुग्घर हवै, कलशा ऊँच मढ़ाय।
बारिक नक्काशी अमित, अंतस बहुते भाय।।

बहुत अकन मंदिर इहाँ, होय हवै निर्माण।
भक्ति भाव पूजा दरश, जन-जन के कल्याण।।

जगन्नाथ मंदिर बने, मुखिया मंदिर तीर।
रथदुतिया मा रथ खिंचे, हो के भक्त अधीर।।

मंदिर अँगना पेड़ बर, पाना अजब अकार।
दोना जइसे ये दिखथे, शबरी भक्ति अपार।।

माँघी पुन्नी मा इहाँ, मेला लगथे खास।
भक्त आँय सरधा सहित, पूरन होवय आस।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

दुलरवा दोहा ~ दंतेश्वरी दंतेवाड़ा

दंतेश्वरी दंतेवाड़ा

दंतेवाड़ा के तीर मा, जंगल ऊँच पहार।
जय दाई दंतेश्वरी, तोर सजे दरबार।।

देवी दाई श्री सती, इहाँ गिरे हे दाँत।
एखर सेती ये जघा, दंतेश्वरी कहात।।

दंतकथा प्रचलित हवय, राजा अन्नमदेव।
देवी दाई भक्त इन, रखय न मन दुरभेव।।

हार मुगलमन ले मिलिस, वन मा भटकै पोठ।
तोला मिलही राज हा, राजा देवी गोठ।।

बिन लहुटे तै रेंगबे, आगू कोत निहार।
पाछू मुड़ के देखबे, खतम तोर विस्तार।।

पाछू मा देवी चलय, घुँघरू बजै सुनात।
राजा आगू बड़ बढ़य, सुरता राखत बात।।

राजिम संगम तीर मा, रेत गड़य जब पाँव।
घुँघरू के आवाज हा, कइसे कहाँ सुनाय।।

देख परिस राजा लहुट, देवी बात भुलात।
गलती होगे तोर ले, देवी दय समझात।।

देवी देइस वस्त्र ला, ढाँकत भुँइया नाप।
जतका कन तैं ढाँकबे, वतके ला तैं खाप।।

डँकनी-शँखिनी दू नदी, होवय जिहाँ मिलान।
कहिन मातु दंतेश्वरी, मोला उँहचे जान।।

मंदिर माता के सुघर, संगम तीर बनाय।
धोती पहिरै तब दरश, राजा रीत चलाय।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

दुलरवा दोहा ~ डोंगरगढ़ धाम

डोंगरगढ़ बमलई

एक नगर कामावती, नाँव अमर इतिहास।
कामकंदला माधवन, कलाकार इन खास।।

कामसेन राजा रहिन, बिमला देवी पूत।
संगीत कला के धनी, देवी भक्त अकूत।।

रहै माधवन बड़ कुशल, बड़का संगीतकार।
कामकंदला नाच मा, राहय बड़ हुशियार।।

कामकंदला माधवन, रहैं राज दरबार।
इन दूनों के बीच मा, होगे मया अपार।।

राजा जानिस बात ला, होगे मन मतवाल।
डाँट-डपट माधवन ला, दे दिस देश निकाल।।

माधव के सुन बात ला, राजा विक्रम क्रुद्ध।।
कामाख्या गढ़ मा करिन, कामसेन ले युद्ध।।

राजामन के युद्ध मा, कखरो जीत न हार।
माँ बमलाई हो प्रगट, ठेनी करिन बिसार।।

कामकंदला माधवन, होगे दूनों एक।
देवी के आशीष ले, कारज होइस नेक।।

बमलाई के मंदिर बने, बहुते ऊँच पहार।
तन-मन मा गूँजय अमित, दाई के जयकार।।

लाखों भक्तन रोज के, दरश करे बर आँय।
सरधा के दू फूल चढ़ा, जगमग जोत जलाँय।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

शुक्रवार, 28 मई 2021

दुलरवा दोहा ~ भोरमदेव

भोरमदेव....

मैकल पर्वत घाट मा, हावय छपरी गाँव।
मंदिर भोरमदेव हे, शिवशंकर के ठाँव।।

फनी नागवंशी इहाँ, राज पाट ल चलाय।
सुग्घर शासन कर अमित, बहुते नाम कमाय।।

मंदिर सौ फिट ऊँच हे, हावय बहुत विशाल।
पर्वत श्रेणी काट के, नागर शैली चाल।।

राज करे हें कलचुरी, देवराय गोपाल।
अद्भुत हिन्दू स्थापना, शिल्पकला सोमाल।।

मंदिर मंडप बड़ सुघर, मुरती अचरिज जान।
करिया पथरा कीमती, शिवशंकर निर्मान।।

पर्वत जंगल बीच मा, मंदिर भोरमदेव।
छोटे खजुराहो अमित, एक बेर जातेव।।

तीरे मा मड़वा महल, बने हवय ये खास।
खंडित मुरती हा घलो, कहत हवय इतिहास।।

अद्भुत हे मड़वा महल, थोरिक अमित हियाव।
रामचंद्र अंबिका करिन, इँहचे अपन बिहाव।।

तीर म वन अभ्यारण्य, देखें ला बड़ आय।
पुरखौती चिन्हा बने, सब ला गजब सुहाय।।

जिनगी जीये के कला, कतका खुल्ला देख।
बात अपन आगू रखँय, देत गवाही लेख।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

दुलरवा दोहा ~ रतनपुर राज

रतनपुर धाम

रतनदेव राजा रहिन, बहुत समय के बात।
राजवंश ये कलचुरी, होइन बड़ विख्यात।।

गँय शिकार मा एक दिन, जंगल मणिपुर गाँव।
रतिहाकुन विश्राम बर, चुनिन पेड़ बर  ठाँव।।

देखिन आधा रात मा, बर खाल्हे उजियार।
लगे महामाया सभा, होवय जय-जयकार।।

बिहना राजा आ लहुट, राजमहल तुम्मान।
उही जघा मंदिर बने, नाँव रतनपुर जान।।

अपन राजधानी बसा, रतनदेव खुशहाल।
कृपा महामाया अमित, भैरव हे दिक्पाल।।

वीर मराठा भोंसले, करिन रतनपुर राज।
एखर पाछू छिन झपट, अंग्रेज करिन काज।।

किला रतनपुर नाँव गज, हावय बड़ प्राचीन।
मंदिर मुरती ले भरे, आज परे हे हीन।।

रामटेकरी हा बने, चोटी ऊँच पहाड़।
देखरेख के हे कमी, होवत हवै उजाड़।।

अमित धरोहर हे हमर, येला रखिन सँभाल।
अवईया पीढ़ी हमर, कहूँ करै न सवाल।।

कभू रतनपुर धाम मा, राहय ताल हजार।
जोत हजारों अब जलँय, माता के दरबार।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

दुलरवा दोहा ~ सिरपुर धाम

सिरपुर महिमा

द्वापर युग के ये नगर, चित्रांगदपुर मान।
महानदी के तीर मा, सिरपुर नगरी जान।।

तइहा के हे बात ये, बबरूवाहन राज।
अश्वमेध घोड़ा धरिस, बाधा पांडव काज।।

राजा बबरू संग मा, अर्जुन युद्ध मताय।
आखिर हारिन पंडवा, गेइन माथ नवाय।।

सोमवंश राजा इहाँ, श्रीपुर नगर बसाय।
अमित राजधानी अपन, सिरपुर ला बनवाय।।

लाली ईंटा ले बने, रानी वसटा हाथ।
लक्ष्मण मंदिर हा खड़े, ऊँचा करके माथ।।

गुप्त काल मंदिर इहाँ, अब हावय अवशेष।
सिरपुर ला जानँय सबो, भारत देश विदेश।।

महानदी के पार मा, गंधेश्वर महराज।
मेला भरथे माँघ मा, जुरथे संत समाज।।

इहाँ उत्खनन अवशेष बड़, मंदिर मुरती स्तूप।
धरम धाम इतिहास के, देखव जानव रूप।।

जैन धरम चिन्हा मिलय, मठ अउ बौद्ध बिहार।
देखे खातिर तैं अमित, संग्रहालय म पधार।

रेंगत लाखों भक्तमन, पहुँचय सिरपुर धाम।
काँवर बोहे जल धरे, लेवत शिव के नाम।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

दुलरवा दोहा ~ राजिम धाम

राजिम महिमा

पावन बड़ छत्तीसगढ़, महिमा हवय बुलंद।
पड़ते राजिम धाम हा, गरियस गरियाबंद।।

महानदी के तीर मा, राजिम नगर बसाय।
पैरी सोंढुर आ मिलै, संगम सुघर कहाय।।

जगतपाल राजा रहिन, महानदी म नहाय।
बड़े फजर आवय इहाँ, राजिम घाट बनाय।।

इही जघा मंदिर बनै, सपना कर साकार।
राजिम तेलिन घर रखे, मुरती ला बइठार।।

राजिम तेलिन हा करै, घानी पखरा दान।
अतके इच्छा ला करिस, नाँव जुरै भगवान।।

राजा सपना सच करै, मंदिर ला बनवाय।
राजिम माता नाँव ले, पूजा पाठ कराय।।

भक्तिन अउ भगवान के, संग चलागत नाम।
राजा के सहयोग ले, राजिम लोचन धाम।।

गढ़े विश्वकर्मा अमित, मंदिर राजिम गाँव।
राजा के आदेश पा, बना डरिस प्रभु ठाँव।।

हवै पंचकोशी तिरिथ, पाँव-पाँव मा नाप।
पुण्य कमा ले तैं अमित, मिट जाही संताप।।

देव कुलेसर जा बसिस, महानदी मझधार।
रतनदेव के हे करम, होवय जय- जयकार।।

माघी पुन्नी मा भरय, मेला नँदिया तीर।
भक्तन राजिम धाम मा, आवँय होय अधीर।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

मंगलवार, 25 मई 2021

दुलरवा दोहा ~ मोबाइल - घाटा

मोबाइल महिमा~घाटा

मोबाइल के बिन इहाँ, होय न एको काम।
मोबाइल के लत अमित, जग ला करै गुलाम।।

खाना-पीना छोड़ दँय, मुसुवा कूदय पेट।
हर कीमत हर हाल मा, मोबाइल अउ नेट।।

धरे-धरे खटिया सुतय, धरे संग उठ पाय।
मोबाइल पहिली अमित, पाछू पाँव उचाय।।

टुरी-टुरा जम्मों गड़े, मोबाइल के बीच।
मनरंजन के नाँव मा, देखँय जीनिस नीच।।

ठेठा बोजे कान मा, गाड़ी कार चलात।
अँधरा भैरा बन चलँय, जबरन कहूँ झपाय।।

बाढ़य धोखा छल कपट, चोरी डाँका लूट।
मोबाइल हा दय अमित, झूठ कहे के छूट।।

मया पिरित के गोठ हा, सब ला नँगत सुहाय।
मोबाइल के ये मया, असली बात छुपाय।।

मोबाइल हा हे नशा, एखर लत बेकार।
रंगरेलहा मन बनँय, खतम होय संस्कार।।

ब्लेकमेल धोखाधड़ी, मोबाइल ले होय।
झूठमूठ के केस मा, फोकट मान ल खोय।।

सावचेत खच्चित रहव, मोबाइल उपयोग।
देखावा के फेर मा, उपजै अंतस सोग।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

दुलरवा दोहा ~ मोबाइल - नफा


मोबाइल महिमा~नफा

मोबाइल महिमा अमित, हावय अपरंपार।
सागर मा गागर भरे, पूजत हे संसार।।

मोबाइल मा ज्ञान हे, थोरिक ध्यान लगाव।
गूगल बाबा के दया, समझव अउ समझाव।।

व्हाट्सएप्प फेसबुक, ट्यूटर इंस्टाग्राम।
अमित सहुलियत दै इही, तुरते बनथे काम।।

मोबाइल के बिना, होवय काज न एक।
मनखे ले जादा हवय, एखर बुद्धि विवेक।।

दाई दीदी देखथें, रँधनी घर के बात।
काम बुता के बात ला, ददा देखथे घात।।

लइका खेलौना कहय, खेलय दिनभर गेम।
खाय पिये ला त्याग दै, भिड़े रहै हर टेम।।

रेल कहाँ हे जान ले, हरय बैंक ये तोर।
टिकट कटा घर मा बइठ, अपने हाथ अँजोर।।

आगे एंड्रॉयड अमित, देख-देख बतियाँय।
मोबाइल के काज ला, जन-जनमन पतियाँय।।

अस्पताल ऑफिस इही, इही तोर बैपार।
मोबाइल भगवान अउ, इही सबल सरकार।।

सुख-दुख हाँसी खुशी, मोबाइल के संग।
सादा सपना ला अमित, इही करय सतरंग।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055

दुलरवा दोहा ~ बेजा कब्जा

बेजा कब्जा

बेजा कब्जा होत हे, गाँव शहर हर ठाँव।
पाँव मढ़ावत नइ बनय, कइसे तोला बताँव।।

चाकर चातर खोर गै, जस तइहा के बात।
हिजगा पारी मा मरँत, गाँव गली सकलात।।

गाड़ा रावन खोर हा, आज सोलखी होय।
धान खार ले लानथें, मुँड मा बोहे रोय।।

बेजा कब्जा होत हे, गाँव गली मइदान।
एको अब बाँचत नहीं, मरघटिया दइहान।।

देखँय सरकारी जघा, झट दैं पथरा गाड़।
अपन बनौकी लँय बना, जनहित जावय भाड़।।

देखा सीखी रोग ये, भाँठा परिया लील।
हाथ बँधे सरकार के, नेता देवँय ढ़ील।।

सुविधा मा बाधा बनँय, बेजा कब्जा झेल।
डर गरीब ला खा मरय, बड़हर मन के खेल।।

तरिया नँदिया नल कुआँ, सब कब्जा के भेंट।
अपने सुविधा ला अमित, अपन हाथ दँय मेंट।।

चाकर चौंरा फोकटे, लोगनमन बनवाय।
बिजली खम्भा हा घलो, अँगना मा घेराय।।

शहर गाँव जम्मों जघा, कब्जा के हे रोग।
निस्तारी मुस्किल अमित, बाढ़त जावय सोग।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

दुलरवा दोहा ~ जनसंख्या

जनसंख्या

जादा लइका राखहू, होहू जी हलकान।
पूर कहाँ ले पारहू, नइ बाँचय धन धान।।

दुब्बर पातर देंह हे, लिरी-लिरी लरियाय।
खाय-पिये के हे कमी, लइका कब मोटाय।।

जादा संख्या बाढ़ही, मचही हाहाकार।
दाना-पानी नइ पुरय, का करही सरकार।।

महतारी लइका अमित, कइसे के सुख पाय।
पोषक जेवन के कमी, कमजोरी बढ़ जाय।।

भुँइया तो बाढ़ै नहीं, मनखे बाढ़त जाय।
रहे-बसे होवय कमी, बेजा कब्जा छाय।।

धन दोगानी कम परय, लइका के बढ़वार।
सदा सुखी राहय उही, जेखर कम परिवार।।

बाढ़त आबादी अमित, दय विकास ला रोक।
रोकथाम खातिर तुमन, देवव गलती टोक।।

रोजी धंधा काम ला, जुरमिल सबो कमाय।
जनसंख्या होवय नँगत, मार-काट मच जाय।।

सुख के रोटी बाँटबो, एक बरोबर यार।
पुरही सब ला काम हा, मिलै सबो अधिकार।।

लइका एक्के झन रखव, पूरन करही आस।
जइसे सूरुज हा रहय, राजा बने अगास।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

दुलरवा दोहा ~ इंटरनेट

इंटरनेट

बड़ उपयोगी नेट हे,  भरे ज्ञान भंडार।।
घर बइठे सब जान लौ, खीसा मा संसार।।

गूगल याहू ज्ञान दँय, सिरतों सुग्घर सोज।
जब जइसे सब जान ले, अमित इँखर ले रोज।।

घंटा भर के काम हा, मिनट लगे हो जाय।
किरपा इंटरनेट के, झटपट सब निपटाय।।

कम्प्यूटर हा देंह हे, इंटरनेट ह प्राण।
मोबाइल के साँस बन, करय जगत कल्याण।।

मनरंजन के रूप मा, देख सिनेमा गीत।
सात समुंदर पार ले, गोठियाय मनमीत।।

पेट भले उन्ना रहै, भूख मार रहि जाँय।
अब तो इंटरनेट बिन, पल भर नइ रहि पाँय।।

हावय सोशल मीडिया, अपन हाथ हथियार।
बात बता बगरा बने, या कर अमित प्रचार।।

अमित फायदा नेट के, अइसन झन तैं जान।
बिगड़ै लइका गेम मा, हवय नँगत नुकसान।।

दिनभर बइठे नेट मा, आँखी परय जोर।
दिल दिमाग रोगी बनय, देखय जौन निटोर।।

चाल चलैं चतुरा इहाँ, रच के मायाजाल।
मया लबारी फाँस के, करदँय बारा हाल।।

होवय इंटरनेट ले, धनदौलत के लूट।
सावचेत राहय सबो, झन लव काँही छूट।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

दुलरवा दोहा ~ नवा जमाना - टुरी

नवा जमाना~ टुरी

कइसन के फैशन करँय, टुरी पिलामन आज।
पहिरै कपड़ा छोटका, देखत आवय लाज।।

हिप्पी चुन्दी राखथें, बेनी ला कटवाय।
दिखय टुरा मन असन, नइ तो चिटिक लजाय।।

चुन्दी राखँय छोटकुन, नख ला बहुत बढ़ाय।
टिकली भुँइया मा परे, नखरा माथ चढ़ाय।।

लामी-लामा गोड़ मा, उँचहा सेंडिल होय।
पीरा उमड़ै पाँव मा, माथा धरके रोय।।

पढ़े-लिखे मा मन नहीं, फैशन मा अघुवाय।
टी.वी. फिक्चर देख के, घुमै-फिरै इँतराय।।

चटके टँगड़ी जींस हा, टॉप छोट पर जाय।
चुनरी बिन छाती रहय, लोफरमन बइहाय।।

चूरी कंगन पाटला, कहाँ दिखै अब हाथ।
टिकली बिंदी के बिना, सुन्ना राहय माथ।।

ब्यूटी पार्लर जाय के, रुआँ अपन उखनाय।
चंदन कपूर छोड़ के, पौडर मा पोताय।।

आँखी काजर मस्करा, जँउहर अकन लगाय।
नकल बिनौरी ला लगा, आँखी अपन सजाय।।

मुँहरंगी ला पोत के, होंठ अपन चमकाय।।
सेंट जबरहा सींच के, गली खोर गमकाय।।

असली तन-मन सादगी, बिरथा फैशन जान।
परंपरा ला छोड़ झन, इही हमर पहिचान।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

दुलरवा दोहा ~ नवा जमाना-टुरा

नवा जमाना~ टुरी

कइसन के फैशन करँय, टुरी पिलामन आज।
पहिरै कपड़ा छोटका, देखत आवय लाज।।

हिप्पी चुन्दी राखथें, बेनी ला कटवाय।
दिखय टुरा मन असन, नइ तो चिटिक लजाय।।

चुन्दी राखँय छोटकुन, नख ला बहुत बढ़ाय।
टिकली भुँइया मा परे, नखरा माथ चढ़ाय।।

लामी-लामा गोड़ मा, उँचहा सेंडिल होय।
पीरा उमड़ै पाँव मा, माथा धरके रोय।।

पढ़े-लिखे मा मन नहीं, फैशन मा अघुवाय।
टी.वी. फिक्चर देख के, घुमै-फिरै इँतराय।।

चटके टँगड़ी जींस हा, टॉप छोट पर जाय।
चुनरी बिन छाती रहय, लोफरमन बइहाय।।

चूरी कंगन पाटला, कहाँ दिखै अब हाथ।
टिकली बिंदी के बिना, सुन्ना राहय माथ।।

ब्यूटी पार्लर जाय के, रुआँ अपन उखनाय।
चंदन कपूर छोड़ के, पौडर मा पोताय।।

आँखी काजर मस्करा, जँउहर अकन लगाय।
नकल बिनौरी ला लगा, आँखी अपन सजाय।।

मुँहरंगी ला पोत के, होंठ अपन चमकाय।।
सेंट जबरहा सींच के, गली खोर गमकाय।।

असली तन-मन सादगी, बिरथा फैशन जान।
परंपरा ला छोड़ झन, इही हमर पहिचान।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~भाटापारा छत्तीसगढ़

सोमवार, 24 मई 2021

दुलरवा दोहा ~ कविता काबर

कविताई काबर

कविता के किरगा भरे, कविवर तहूँ कहाय।
किचिर-पिचिर लिखना करे, कतका नाँव कमाय।।

रोज-रोज कविता अमित, लिखे कहाँ ले जाय।
छलकै हिरदै भावना, खुदे कलम लिखवाय।।

आज करेजा भाव ला, कोन इहाँ अपनाय।
देख समस्या पूर्ति बर, कविता लिखते जाय।।

दस कविता जौने पढ़य, तभे एक लिख पाय।
लिखथे रोजे दस बीस जे, वो कतका पढ़ पाय।।

कविता काबर तैं लिखस, का हे तोला भान।
काखर खातिर काय बर, कलम चलाये जान।।

कविता के मेला लगै, सबो माल बेंचाय।
भीतर अंतस भाव हे, वोहा सर-मर जाय।।

आज जमाना हैं उलट, कविवर उही कहाय।
उटपटांग लिखई करे, उही इनामी पाय।।

कविता लिखई नाँव मा, लूट मचे हे आज।
शिल्प व्याकरण के कमी, अमित उही कविराज।।

कविता के बेरा कहाँ, सकही कोन बताय।
अंतस उमड़ै भावना, रचना तभे रचाय।।

कमती कविता कीमती, लिखलव सोंच विचार।
लिख-लिख खरही गाँजना, होवय सब बेकार।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

दुलरवा दोहा ~ तरिया

तरिया

जौन गाँव तरिया रहय, निस्तारी सब होय।
जिहाँ कुआँ तरिया नहीं, माथ पकड़ सब रोय।।

तरिया मा पानी रहय, प्राणी पियास बुझाय।
मनखे खलखल ले अमित, कपड़ा धोय नहाय।।

तीर तार तरिया रहै, खेत-खार हरियाय।
बड़ सुग्घर पर्यावरण, सब ला गजब सुहाय।।

तरिया डबरी के रहत, बोरिंग पानी आय।।
बिन तरिया जम्मों जघा, गरमी परत सुखाय।।

बादर ले पानी गिरय, बिरथा बड़ बोहाय।
परिया भाँठा गाँव ले, तरिया मा सकलाय।।

तरिया के पानी अमित, आय सिंचाई काम।
राखे राहव गाँव मा, जिंदा एखर नाम।।

तरिया भीतर कीच मा, ढेंस पोखरा होय।
केंवट काँदा खोखमा, खावत तन-मन खोय।।

पानी के सकला जतन, तरिया तुमन बचाव।
धन के लोभी ला अमित, बइठ सुघर समझाव।।

संसो बाढ़त आज हे, तरिया देंवँय पाट।
अब विकास के नाँव मा, रुखराई दँय काट।।

अमित मिलै झन गंदगी, तरिया पानी संग।
बड़ बीमारी बाढ़ही, जिनगी होही तंग।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ 9200252055...©®

दुलरवा दोहा ~ नँदिया

नँदिया
नँदिया जनमैं नानकुन, कोनो ऊँच पहार।
आगू वो बढ़ते चलय, बढ़ते जावय धार।।

पानी पूरा भर चलय, लहर-लहर लहराय।
निर्मल जल सब ला मिलय, जिहाँ-जिहाँ बोहाय।।

नागिन जइसे रूप हे, हिरनी जइसे चाल।
चउमासा मा देख ले, नँदिया ला विकराल।।

नँदिया सागर मा मिलय, जइसे के लगवार।
पहुँचय बाधा टोर के, खुश होवय पोटार।।

गरजै बादर जोर के, ठाढ़े देवय चीर।
बरसै पानी झूम के, नँदिया अमित अधीर।।

नँदिया के पानी सुघर, छेंकव खच्चित बाँध।
बिरथा भागय जल कहूँ, बद्दी अपने खाँध।।

खेती ला पानी मिलय, फसल हमर लहराय।
रोकव पानी बाँध मा, बात अमित समझाय।।

बिजली बनही बाँध ले, पानी कहूँ बचान।
घर अँगना रोशन रही, होही बड़ धन धान।।

पीये खातिर साफ जल, नँदिया ले हम पान।
कचरा काबर फेंक हम, बइरी इँखर कहान।।

रेती पखरा हेर के, देवन सकल बिगाड़।
बिफरै जब नँदिया अमित, करदै गजब बिगाड़।।

नँदिया महतारी असन, पूरन करथे आस।
कइसे के बेटा तुमन, फेंकव येमा लाश।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

रविवार, 23 मई 2021

दुलरवा दोहा ~ खेती खार

खेती खार
अपने भुँइया मा गिरय, लहू पछीना धार।
देव मान सेवा करव, अपने खेती खार।।

खेती सरवन काज हे, जग के सेवा होय।
पेट पलै सबके बने, भले एक झन बोय।।

खेती सबले हे बड़े, मँझला हे बैपार।
अधम काज हे नौकरी, अमित भीख बेकार।।

खेती पूजा पाठ हे, महिनत एखर धर्म।
आलस अंतस हथकड़ी, साधव सेवा कर्म।।

खेती होथे चेतलग, अपने सेती जान।
भाई नौकर ले बुता, नाश किसानी मान।।

अपने खेती दम अपन, मेड़ पार मा जाग।
रतिहा घर मा जा सुते, काट चोरहा भाग।।

खुर्रा जोंतय खेत ला, तभे फसल हा होय।
नाँगर कच्चा मा चलय, फेर बीज हा सोय।।

बन कचरा उपजै बिकट, वो खेती बेकार।
बइला दूनों बेंच के, धंधा पानी डार।।

बिजली चमकै चैत मा, पानी हा बइसाख।
लहकत गरमी जेठ मा, खच्चित बरसा लाख।।

परहित कारज मान के, खेती करय किसान।
सरी जगत भोजन करय, अनदाता हलकान।।
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कन्हैया साहू 'अमित' ~ भाटापारा छत्तीसगढ़

चंद्रयान अभिमान

चंद्रयान  ले  नवा  बिहान,  हमर तिरंगा, बाढ़य शान। रोवर चलही दिन अउ रात, बने-बने बनही  हर  बात, दुनिया होगे अचरिज आज, भारत मुँड़़ अब सजगे ताज, ...